संविधान हत्या दिवस : आपातकाल का जिक्र वोट की फसल या लोकतंत्र की फिक्र ?
कुछ रफा दफा करना हो तो कहते हैं मिट्टी डालो लेकिन राजनीति में किसी की मिट्टी पलीद करने के लिए गड़े मुर्दे उखाड़ने का खूब प्रचलन रहा है। बीजेपी का प्रयास रहा है कि कांग्रेस की साख को मिट्टी के मोल जितना कर देना है। उसके नाम को मिट्टी में मिला देने की चाहत के साथ मिट्टी खोद कर 50 साल से भी अधिक पुराने मुद्दे को निकाला जाता रहा है।
संविधान हत्या दिवस
कांग्रेस विरोधी दल साल दर साल, हर साल आपातकाल को याद करते हैं। पकड़ पकड़ कर कैम्प में ला कर जैसा लोगों के साथ किया गया, वैसे ही संविधान, नागरिक अधिकार, मीडिया की स्वतंत्रता जैसी प्रदत्त शक्तियों की, जबरिया नसबंदी कर दिया गया था। न्यायपालिका के निर्देश को रद्द करते हुए राजशाही अंदाज में, कुर्सी पर कब्जा करने के साथ राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को पस्त करने के लिए, सिस्टम की शक्ति का दुरूपयोग करने का कांग्रेस को दोषी ठहराते हुए, बीजेपी संविधान हत्या दिवस मना रही है।

उल्टे बीजेपी पर संविधान बदलने का आरोप !
आपातकाल के दौरान चार बार सुविधा अनुसार संविधान संशोधन किया गया। लेकिन कांग्रेस भी दुर्लभ मिट्टी की गढ़ी है। उल्टे वही बीजेपी पर चुनावी अभियान के दौरान संविधान बदलने को तैयार बताते हुए आरोपों की बौछार करती रही है। मिट्टी पलीद करने से मिट्टी में मिलाने तक के इस सियासी प्रयास को देख सुन समझ रहे मतदाता मिट्टी के माधव तो हैं नहीं, जो किसी ने कुछ कहा और उसे मान लिया। वो भी मिट्टी और सोना में फर्क जानते हैं। परीक्षण निरीक्षण करते हैं। विवेक से निर्णय लेते हैं।
कांग्रेस के ताबूत में आखरी कील !
उसमें एक महत्वपूर्ण कड़ी है उनकी स्मरण शक्ति। जीवन यापन के जद्दोजहद में जनता कुछ भी जल्दी भूल जाती है ऐसे में बीजेपी जनता को बार बार आपातकाल की याद दिलाती रहती है हर साल उसी दिन देशव्यापी कार्यक्रम का आयोजन कर कांग्रेस के ताबूत में आखरी कील ठोकने की ठसक में उसे लोकतंत्र का विरोधी करार देती रही है ऐसे में हम भी सवाल तो पूछेंगे आपातकाल का जिक्र वोट की फसल या लोकतंत्र की फिक्र ?
सवाल तो पूछेंगे वीडियो देखने के लिए यहां CLICK करें
दीपक शर्मा, सीनियर एंकर





