JHARKHAND NEWS : JSSC CGL रद्द होना एकतरफा: चयनित अभ्यर्थियों का हाई कोर्ट जाने का ऐलान
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की सीजीएल (CGl) परीक्षा और उसके बाद हुई नियुक्तियों को लेकर एक बहुत बड़ा मोड़ आ गया है। सरकार की ओर से नियुक्ति रद्द करने की घोषणा के बाद अब इस पर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि जिन अभ्यर्थियों की नौकरी चली गई है, उनका भविष्य अब क्या होगा?
सरकार के इस फैसले के बाद प्रभावित अभ्यर्थियों ने कानूनी विशेषज्ञों से संपर्क साधना शुरू कर दिया है। हाई कोर्ट के अधिवक्ता विनोद सिंह का कहना है कि सरकार का यह निर्णय पूरी तरह से एकपक्षीय है।
अधिवक्ता विनोद सिंह के अनुसार, सरकार ने बिना किसी निष्पक्ष जांच और नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना यह कदम उठाया है, जो सीधे तौर पर 'नैसर्गिक न्याय' (Natural Justice) के खिलाफ है। इन अभ्यर्थियों की नियुक्ति अदालत के आदेश पर ही हुई थी और मेरिट के आधार पर इन्हें नौकरी मिली थी। कुछ लोगों की गड़बड़ी के कारण इतनी बड़ी संख्या में योग्य युवाओं को नौकरी से बाहर करना उनके साथ सरासर अन्याय है। इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
हालांकि, वकीलों का यह भी कहना है कि जब तक सरकार की तरफ से इस संबंध में कोई आधिकारिक आदेश या संकल्प (Notification) जारी नहीं किया जाता, तब तक हाई कोर्ट में औपचारिक याचिका दाखिल करना संभव नहीं है। उस आदेश में परीक्षा रद्द करने का आधार स्पष्ट किया जाएगा, जिसके बाद अभ्यर्थी अपनी आगे की रणनीति तय करेंगे। प्रभावित युवाओं का यह भी तर्क है कि उनकी नियुक्ति हाई कोर्ट के आदेश के पालन में हुई थी, इसलिए इस तरह का फैसला कोर्ट की अवमानना का भी मामला बन सकता है।
दूसरी तरफ, JSSC CGL पेपर लीक मामले को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार का नजरिया इसके बिल्कुल उलट है।
अजीत कुमार का कहना है कि सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य और उत्साहवर्धक है। इस मामले की चल रही जांच में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध थे। हाल ही में CID जांच के दौरान कई नए और पुख्ता सबूत भी सामने आए हैं। ऐसी स्थिति में दागी (जिनकी संलिप्तता पाई गई) और गैर-दागी अभ्यर्थियों के बीच फर्क करना बेहद मुश्किल हो जाता। यही वजह है कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को ही निरस्त करना पड़ा।संक्षेप में कहें तो एक तरफ जहां नौकरी गंवाने वाले युवा इसे अपने अधिकारों का हनन और नैसर्गिक न्याय के खिलाफ बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जांच और साक्ष्यों के आधार पर पूरी प्रक्रिया को रद्द करने को सही ठहराया जा रहा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार की ओर से आधिकारिक संकल्प कब जारी होता है और यह मामला आगे हाई कोर्ट में क्या नया मोड़ लेता है।





