BIHAR NEWS : SC ने सिन्हा इंस्टीट्यूट एवं सचिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी एक्ट, 2015 को असंवैधानिक घोषित कर किया रद्द

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पटना: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में बिहार सरकार द्वारा बनाए गए श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूट एवं सचिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी( रेक्विजीशन एंड मैनेजमेंट) एक्ट,2015 को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया.

कोर्ट ने कहा कि यह कानून मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सिविल अपील संख्या 13581/2025,अनुराग कृष्ण सिन्हा बनाम बिहार राज्य में यह निर्णय सुनाया. अपीलकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता सुनील कुमार ने पक्ष रखा.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के 29 फरवरी,2024 के उस निर्णय को भी रद्द कर दिया,जिसमें उक्त अधिनियम को वैध ठहराया गया था.

लगभग एक सदी पुरानी संस्था के सम्बन्ध में कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूट एवं सचिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना वर्ष 1924 में बिहार के प्रतिष्ठित सार्वजनिक व्यक्तित्व डॉ. सचिदानंद सिन्हा ने अपनी पत्नी श्रीमती राधिका सिन्हा की स्मृति में की थी. इस संस्था की स्थापना शिक्षा,अध्ययन और सार्वजनिक बौद्धिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने लाइब्रेरी और संस्थान के अधिग्रहण के लिए कोई ठोस कारण या जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की. रिकॉर्ड की जांच में यह भी सामने आया कि सरकार ने ट्रस्ट या उसके ट्रस्टियों को कभी यह नहीं बताया कि संस्था में किसी प्रकार की कुप्रबंधन या वित्तीय अनियमितता हो रही है.

कोर्ट ने कहा कि बिना किसी जांच या ठोस आधार के एक सदी से संचालित संस्था का पूरा अधिग्रहण कर लेना अनुचित और असंगत है. राज्य सरकार का तर्क था कि अधिनियम का उद्देश्य लाइब्रेरी का बेहतर प्रबंधन और विकास करना है.

परंतु सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ट्रस्ट को समाप्त करना और संस्था को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेना अत्यधिक और अनुपातहीन कदम है.

कोर्ट ने यह भी कहा है कि सरकार चाहती,तो वित्तीय सहायता,निगरानी या अन्य प्रशासनिक उपायों के माध्यम से भी संस्था के विकास में सहयोग कर सकती थी.

सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम की उस धारा पर भी आपत्ति जताई,जिसमें अधिग्रहण की स्थिति में अधिकतम एक रुपये तक मुआवजा देने का प्रावधान किया गया था. कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रावधान संपत्ति के अधिकार के सिद्धांत के विपरीत है और इसे मनमाना तथा लगभग जब्ती प्रकृति का माना जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अधिनियम रद्द होने के बाद लाइब्रेरी और संस्थान का प्रबंधन पूर्व की स्थिति में ट्रस्ट को वापस सौंपा जाएगा. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार कानून के अनुसार वित्तीय सहायता,प्रशासनिक सहयोग या नियामक निगरानी जारी रख सकती है.

अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनमानी विधायी कार्रवाई भी अनुच्छेद 14 के तहत असंवैधानिक हो सकती है और कोर्ट को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है.

यह निर्णय बिहार की ऐतिहासिक सिन्हा लाइब्रेरी से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद का महत्वपूर्ण निष्कर्ष माना जा रहा है.

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट--