पापा, आप डॉक्टर हैं… ऐसे कैसे छोड़ देंगे? : एक बेटे की आवाज़ ने डॉक्टर को झकझोड़ दिया और सड़क पर हारती ज़िंदगी को जिताया

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पटना : राजधानी पटना की एक सर्द और खामोश रात का वक्त था. दानापुर ओवरब्रिज के पास सड़क पर खून से सना एक युवक बेसुध पड़ा था. राहगीर रुकते हैं, देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. किसी को डर है, किसी को जल्दी. इसी भीड़ और बेबसी के बीच जिंदगी चुपचाप दम तोड़ने के कगार पर थी. तभी वहां से एक कार गुजरती है, जिसमें बैठे हैं एम्स पटना के ट्रॉमा हेड डॉ. अनिल कुमार और उनका बेटा आदित्य.

सड़क किनारे पड़े युवक को देखकर कार रुकती है. डॉ. अनिल उतरते हैं,नब्ज टटोलते हैं और पल भर को उन्हें लगता है—शायद देर हो चुकी है. लेकिन तभी पीछे से एक मासूम-सी आवाज़ आती है, “पापा,आप डॉक्टर हैं…ऐसे कैसे छोड़ देंगे?”उस एक वाक्य ने न सिर्फ डॉ. अनिल को रोका,बल्कि मौत के फैसले को भी टाल दिया.

डॉ. अनिल दोबारा घायल युवक के पास झुकते हैं. खून से लथपथ चेहरा,बंद होती सांसें…वक्त बहुत कम था. उन्होंने सड़क पर ही अपनी मेडिकल ट्रेनिंग पर भरोसा किया.‘जॉ-थ्रस्ट’तकनीक से युवक का वायुमार्ग खोला और मुंह से सांस देकर उसे ज़िंदगी से जोड़े रखा. कुछ ही सेकेंड में चमत्कार हुआ—युवक की सांसें लौट आईं.

घायल की पहचान सॉफ्टवेयर इंजीनियर चंद्र किशोर गुप्ता के रूप में हुई. तत्काल एंबुलेंस बुलाई गई और उसे एम्स ट्रॉमा सेंटर पहुंचाया गया. डॉक्टरों के अनुसार अगर कुछ मिनट और देर हो जाती,तो शायद कहानी यहीं खत्म हो जाती.

आज चंद्र किशोर खतरे से बाहर है. इस घटना ने यह साबित कर दिया कि डॉक्टर की ड्यूटी अस्पताल के गेट पर खत्म नहीं होती. कभी-कभी एक बेटे की संवेदनशील सीख और एक डॉक्टर का साहस, सड़क पर भी भगवान को जिंदा कर देता है.

दानापुर से अभय राज की रिपोर्ट--