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JHARKHAND NEWS : झारखंड में बारिश की बेरुखी से ठप हुआ बालू कारोबार, नदियों में रेत का नामोनिशान नहीं

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झारखंड के बरवाडीह क्षेत्र में बादलों की बेरुखी ने अब एक नई चिंता खड़ी कर दी है। खेतों की प्यास तो दूर, इस कम बारिश का असर अब उस कारोबार पर भी दिखने लगा है, जिस पर हज़ारों लोगों का चूल्हा जलता है—जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बालू के कारोबार और नदियों के प्राकृतिक संतुलन की। इस साल बरवाडीह में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है। इसका नतीजा यह है कि कोयल और धड़धड़ी जैसी स्थानीय नदियों में अब तक वह सामान्य उफान या बाढ़ नहीं आई, जो हर साल आती थी। जानकारों के मुताबिक, मानसून के तेज बहाव के साथ पहाड़ी इलाकों से बहकर आने वाली नई रेत ही नदी तल का प्राकृतिक पुनर्भरण करती है। यानी, आने वाले सीजन के लिए बालू का स्टॉक इसी प्राकृतिक प्रक्रिया पर टिका होता है। लेकिन इस बार बारिश कम होने से यह चक्र थम सा गया है।

नदियों से सालभर बालू का उठाव तो होता है, पर अगर मानसून में उसकी भरपाई न हो, तो संकट गहराना लाजिमी है। कारोबारियों की मानें तो यदि आने वाले दिनों में मूसलाधार बारिश नहीं हुई, तो अगले सीजन में बालू मिलना मुश्किल हो जाएगा। इसका सीधा असर निर्माण कार्यों पर तो पड़ेगा ही, साथ ही इस व्यवसाय से जुड़े हज़ारों मजदूरों, ट्रक-ट्रैक्टर चालकों और छोटे व्यापारियों की रोजी-रोटी पर भी गंभीर संकट आ जाएगा।फिलहाल, बरवाडीह के लोगों और कारोबारियों की निगाहें पूरी तरह आसमान पर टिकी हैं। उन्हें उम्मीद है कि मानसून अभी अपनी मेहरबानी दिखाएगा, नदियां उफ़ान पर आएंगी और प्राकृतिक रूप से बालू का नया जमाव हो सकेगा, जिससे यह संभावित संकट टल सके।इस पूरे मामले पर बरवाडीह के अंचलाधिकारी लवकेश सिंह का कहना है कि नदियों में बालू का प्राकृतिक पुनर्भरण पूरी तरह से बारिश और जल प्रवाह पर निर्भर है। प्रशासन का यह भी मानना है कि बालू का खनन हमेशा सरकार के निर्धारित नियमों और पर्यावरणीय मानकों के दायरे में ही होना चाहिए, ताकि नदियों का प्राकृतिक संतुलन भी बना रहे और भविष्य के लिए यह संसाधन सुरक्षित भी रहें।