JHARKHAND NEWS : BDO पर भ्रष्टाचार और वन अधिनियम का उल्लंघन के साथ अबुआ आवास योजना में सरकारी राशि का हुआ दुरुपयोग

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DESK : झारखंड के गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड में एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) निशा कुमारी पर अबुआ आवास योजना के तहत अधिसूचित सुरक्षित वन भूमि पर अवैध स्वीकृति देने, सरकारी राशि के दुरुपयोग, और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। स्थानीय सोशल एक्टिविस्ट और पर्यावरणविद् संतोष कुमार दास ने इस मामले को उजागर करते हुए सचिव, ग्रामीण विकास विभाग, झारखंड सरकार को एक विस्तृत शिकायत पत्र सौंपा है, जिसमें निशा कुमारी के खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई की मांग की गई है। इस मामले ने न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जनता के विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाई है।

क्या है पूरा मामला?

संतोष कुमार दास द्वारा दायर शिकायत के अनुसार, निशा कुमारी ने वित्तीय वर्ष 2024-2025 में अबुआ आवास योजना के तहत तारा कुमारी पांडे, पति सन्नू कुमार पांडे, निवासी ग्राम खेतको, थाना बगोदर, जिला गिरिडीह, को आवास निर्माण के लिए स्वीकृति दी। इस स्वीकृति (रजिस्ट्रेशन आईडी 2870907) के तहत मौजा - खेतको, प्लॉट संख्या - 5979 पर मकान निर्माण के लिए राशि आवंटित की गई। लेकिन यहाँ चौंकाने वाली बात यह है कि उक्त प्लॉट अधिसूचित सुरक्षित वन भूमि (प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट) है, जैसा कि अधिसूचना संख्या C.P.F-10152/52-5801-R-D-27-12-1952, दिनांक 27/12/1952 द्वारा सत्यापित है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 33 और वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा 2 के तहत ऐसी भूमि पर कोई गैर-वानिकी गतिविधि, जैसे मकान निर्माण, बिना सक्षम स्तर की अनुमति के पूरी तरह अवैध है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों, जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad vs. Union of India (1995) और Lafarge Umiam Mining Pvt. Ltd. vs. Union of India (2011) में भी वन भूमि पर अतिक्रमण को सख्ती से प्रतिबंधित किया गया है। फिर भी, निशा कुमारी ने बिना स्थलीय निरीक्षण या भूमि की प्रकृति की जाँच किए, इस अवैध स्वीकृति को मंजूरी दी और सरकारी राशि का भुगतान भी किया।

सरकारी राशि का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि निशा कुमारी ने तारा कुमारी पांडे को अबुआ आवास योजना के तहत किस्तों में सरकारी राशि का भुगतान किया, जो जनता के कर से प्राप्त होती है। यह राशि ऐसी भूमि पर खर्च की गई, जहाँ निर्माण अवैध था। यह कार्य भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13 के तहत दंडनीय अपराध माना जाता है संतोष दास का कहना है कि यह जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात है। सरकारी राशि का दुरुपयोग और वन नियमों का उल्लंघन न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को भी उजागर करता है।

वनकर्मियों पर झूठे आरोप

यह मामला यहीं खत्म नहीं होता, जब वन विभाग ने 28 मई 2025 को कार्रवाई करते हुए उक्त अवैध ताजा निर्माण (दीवार) को हाथ से धक्का देकर गिरा दिया और तारा कुमारी पांडे के खिलाफ अपराध प्रतिवेदन (कम्प्लेन केस नं. 1048/2025) दर्ज किया, तो निशा कुमारी ने अपनी गलतियों को छिपाने के लिए वनकर्मियों के खिलाफ बगोदर थाने में कांड संख्या 131, दिनांक 30/05/2025 के तहत एक झूठी FIR दर्ज करवाई। संतोष दास ने BDO पर अरोप लगाते हुए कहा कि सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करते हुए, वनकर्मी अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे थे, लेकिन BDO ने उन्हें अनावश्यक रूप से कानूनी परेशानी में डालने की कोशिश की। यह उनके पद की गरिमा के खिलाफ है।

पर्यावरण को खतरा

इस अवैध स्वीकृति का सबसे गंभीर परिणाम पर्यावरण पर पड़ा है। अधिसूचित वन भूमि पर निर्माण से न केवल वन क्षेत्र का अतिक्रमण हुआ, बल्कि जैव-विविधता और वन्यजीवों को भी संभावित नुकसान पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के महत्व को रेखांकित किया है, लेकिन निशा कुमारी की कर्रवाई इन सिद्धांतों के खिलाफ है. यदि ऐसी गतिविधियों को नहीं रोका गया, तो हमारा पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन गंभीर खतरे में पड़ जाएंगे।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। रांची के वकील रंजन विद्रोही ने कहा, “यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल आपराधिक मामला है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल उठाता है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस मामले में वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर सकता है, क्योंकि सरकारी राशि का दुरुपयोग PMLA के दायरे में आ सकता है।