“न खेलब, न खेले देब, खेलवे बिगाड़ब” : राज्यसभा चुनाव में झारखंड बीजेपी ने भुलाई मोदी की नसीहत
पटना- “न खेलब, न खेले देब, खेलवे बिगाड़ब” प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार संसद में अपने संबोधन के दौरान विपक्ष के व्यवहार से आहत होकर कहा था कि ‘हम प्रोगेसिव पॉलिटिक्स में विश्वास करते हैं, भोजपुरी में एक कहावत है कि 'न खेलब, न खेले देब, खेलवे बिगाड़ब जब तथ्यों के आधार पर बात चलती नहीं है तो ऐसा माहौल पैदा किया जाता है'। पीएम अपने संबोधन के दौरान किसानों से आंदोलन खत्म करने की अपील कर रहे थे, सरकार का मानना था कि कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इस मामले का हल नहीं चाहते थे।
अब आप सोच रहे होंगे की हम 2021 की बात अभी क्यों दोहरा रहे हैं, आज के मुद्दे से इसका क्या मतलब, तो पहले आज का हमारा मुद्दा बता देतें हैं फिर उस मुद्दे से इन सब का सरोकार बताएंगे। मुद्दा है झारखंड में राज्यसभा का दो सीटों पर होने वाला चुनाव। मैदान में तीन दावेदार खम ठोक रहे हैं, ऐसे में अंकगणित ये इशारा कर रहा कि बस छू कर निकलने वाली स्थिति है, तलवार की धार पर चलते हुए बच निकलने वाली नौबत हो गई है। जरा सा दांए बांए हुए नहीं कि सब गुड़ गोबर हो जाएगा। बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा और ऐसी नौबत इसलिए आई है क्योंकि मैदान में मुकाबले को तैयार तीसरे दावेदार को बीजेपी ने समर्थन दे दिया है।
अब बीजेपी के पास अपना प्रत्याशी उतारने और उसे जिताने लायक आंकड़ा है नहीं। नितिन नबीन भी दो दिन झारखंड में रूके, संभावना है कि अंक गणित की उलझन को सुलझाने का भरसक प्रयास किया। सत्ताधारी गठबंधन ने इस दौरान पार्टी पर हॉर्स ट्रेडिंग के प्रयास का खुल कर आरोप भी लगाया पर लगता है गोटी सेट नहीं होने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली चल दिए और झारखंड में राज्यसभा चुनाव में पार्टी के रूख ने वो बात याद दिला दी जो कभी मोदी जी ने विरोधियों के इरादे बताने के उद्देश्य से कहा था। न खेलब, न खेले देव, खेलवे बिगाड़ब। अब आप बताइए हमारे मुद्दे से मोदी जी की ये बात मैच करती है न ?
आंकड़ो को विस्तार से बताने की जरूरत नहीं वो आप सब जान रहे हैं। बस इतना जानिए की JMM और कांग्रेस के प्रत्याशी की जीत के लिए कट टू कट संख्या बल है, लेकिन यहीं, निर्दलीय प्रत्याशी के नाम पर बीजेपी उनका खेल बिगाड़ने का प्रयास करने का ठीकरा अपने मत्थे मढ़ने की छूट देती दिख रही है। वैसे कह सकते हैं राजनीति के खेल में साम, दाम, दंड, भेद के सामने शुचिता का राग अलापना बेसुरा होना ही लगता है। ऐसे में पूछा जाएगा कि जिस दल से नेता शुचिता की सीख दूसरों को देते हैं उनके अपने नेता उसपर अमल क्यों नहीं करते हैं ?
पटना से दीपक शर्मा की स्पेशल रिपोर्ट





