झारखंड विधानसभा : सत्र के तीसरे दिन पक्ष-विपक्ष आमने-सामने,नेता प्रतिपक्ष बोले-आदिवासियों के हित में सरकार को विचार करने की जरूरत

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रांची: झारखंड विधानसभा में बजट सत्र के तीसरे दिन नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पूरे झारखंड में सरकार को नए सिरे से विकास करनी चाहिए. यहां के आदिवासियों के लिए उनकी कमाने खाने का एक मात्र साधन खेती हैं. इसलिए इस बात का सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि जिसकी जमीन से खनिज निकल रहे हो उसकी उतनी जमीन व्यवस्था करें. सरकार को इस पर विचार करनी चाहिए. नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरकार को जनता की तकलीफ को समझना चाहिए.

'अबुआ सरकार नहीं बाबू लोग की सरकार है'

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि जमीन को लेकर झारखंड में असंख्य लोग शहीद हुए हैं. यह अबुआ सरकार नहीं बाबू लोग की सरकार है. जमीन पर जाकर देखिये की उनका दर्द क्या है. इसलिए ये बाबू लोग समाधान नहीॆ निकाल पाते, हेमंत सोरेन पति-पत्नी खूब घूमते हैं. कहीं ऐसा ना हो कि लालू-राबड़ी की तरह आजीवन कोर्ट का चक्कर लगाना पड़े. झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में जमीन का नेचर चेंज कर के दलालों द्वारा बेचा जा रहा है.

'झारखंड में भी होना चाहिए SIR'

रांची सदर विधायक सीपी. सिंह ने एसएआर मामले पर बयान देते हुए कहा कि इस मुद्दे का विरोध पहले भी कई बड़े नेताओं ने किया था. उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव ने भी इसका विरोध किया था, फिर भी यह लागू हुआ. ऐसे में झारखंड के मंत्री इससे क्यों डर रहे हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल में भी ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं. सीपी सिंह ने कहा कि झारखंड में भी यह होना चाहिए.

वहीं, इरफान अंसारी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनका नाम बार-बार क्यों लिया जा रहा है और वे कौन हैं. स्वास्थ्य मंत्री के पद पर रहते हुए पहले उन्हें स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारना चाहिए. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे”.

एसआईआर मुद्दा गरमाया

एसआईआर मुद्दें पर आज झारखंड विधानसभा में मुद्दा गरमाता दिखा. इस पर मंत्री इरफान अंसारी ने कहा कि बीजेपी के नेता गुमराह कर रहे हैं. उन्होंने बीजेपी पर सवाल उठाते हुए हिंदुस्तान में कितने जातियां रहती है बीजेपी वालों को यह भी नहीं पता. जबकि, बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था. इरफान अंसारी ने कहा कि बीजेपी कभी फिल्म दिखाकर जनता को गुमराह कर रही हैं, तो कभी झारखंड में SIR का मुद्दा छेड़कर. बाकी निर्णय मुख्यमंत्री को लेना हैं.