बिहार में शराबबंदी पर सियासत तेज : सहयोगी दल के बयान से बढ़ी हलचल, बीजेपी ने कहा- कानून में नहीं होगा बदलाव
पटना : बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है. करीब 10 साल से लागू इस कानून पर अब सवाल उठने लगे हैं—और खास बात यह है कि ये सवाल सत्ता पक्ष के सहयोगी दल की तरफ से ही उठे हैं. राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता माधव आनंद ने सरकार से शराबबंदी कानून की समीक्षा करने की मांग की है, जिससे राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है.
बिहार में यह कानून साल 2016 में लागू किया गया था,जब राज्य की कमान नीतीश कुमार के हाथों में थी. इसे सामाजिक सुधार के बड़े कदम के तौर पर देखा गया और खासकर महिलाओं के बीच इसका व्यापक समर्थन मिला. सरकार का दावा रहा है कि इससे अपराध और घरेलू हिंसा में कमी आई है. हालांकि,समय के साथ अवैध शराब के कारोबार,बढ़ती गिरफ्तारियां और न्यायिक दबाव जैसे मुद्दों ने इस कानून की प्रभावशीलता पर सवाल भी खड़े किए हैं.
इसी बीच माधव आनंद के बयान ने बहस को और तेज कर दिया है. उनका कहना है कि 10 साल बाद अब इस कानून के प्रभाव और व्यवहारिकता की समीक्षा जरूरी है. उनके इस बयान को एनडीए के भीतर अलग-अलग राय के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
वहीं,विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है. विपक्षी दलों का आरोप है कि एनडीए के अंदर ही अब नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट पर सवाल उठने लगे हैं और इसे धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिश हो रही है.
हालांकि बीजेपी ने इस बयान से साफ दूरी बना ली है. पार्टी प्रवक्ता सुमित शशांक ने कहा है कि शराबबंदी कानून ने बिहार के सामाजिक ढांचे में बड़ा बदलाव लाया है और इसे किसी भी हालत में बदला नहीं जाएगा. उन्होंने माधव आनंद के बयान को व्यक्तिगत राय बताया.
फिलहाल इस पूरे मामले ने बिहार की सियासत में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है. अब नजरें सम्राट चौधरी सरकार पर है कि वह इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है.
पटना से संजय कुमार की रिपोर्ट---





