आस्था या अंधविश्वास ? : सारण के तरैया में मेला में मिट्टी के घोड़े लूटने से पुत्र प्राप्ति की मान्यता, जानिए पूरी कहानी
छपरा : विज्ञान और आधुनिक तकनीक के इस दौर में भी आस्था और परंपराओं का असर ग्रामीण समाज में गहराई से देखने को मिलता है. सारण जिले के तरैया प्रखंड के एक गांव में लगने वाला दो दिवसीय “घोड़ा लुटावन पुत्र पावन मेला” इसी का अनोखा उदाहरण है, जहां लोग आज भी मिट्टी के घोड़े लूटकर पुत्र प्राप्ति और मनोकामना पूरी होने की मान्यता रखते हैं.
चैत माह की दशमी तिथि को आयोजित होने वाला यह मेला पिछले कई दशकों से लगातार लगता आ रहा है. समय के साथ इसका स्वरूप भले बदल गया हो,लेकिन लोगों की आस्था आज भी वैसी ही बनी हुई है. पहले जहां दंपती पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर यहां पहुंचते थे,वहीं अब युवक-युवतियां भी नौकरी और अन्य इच्छाओं की पूर्ति के लिए इस परंपरा में भाग लेने लगे हैं.
कैसे होती है‘घोड़ा लूटने’की परंपरा
मेले में श्रद्धालु पहले मिट्टी के घोड़े खरीदकर मंदिर में अर्पित करते हैं. इसके बाद अन्य श्रद्धालु उन घोड़ों को“लूटकर”अपने साथ ले जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से घोड़ा लूटने पर मनोकामना पूरी होती है.
लूटे गए घोड़े को लोग लाल कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रखते हैं और जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है,तो अगले वर्ष उसी तिथि पर घोड़े की जोड़ी चढ़ाकर आभार प्रकट करते हैं.
बदलता स्वरूप,बढ़ती भीड़
अब इस मेले में केवल पारंपरिक श्रद्धालु ही नहीं,बल्कि बड़ी संख्या में युवा भी शामिल होने लगे हैं. कई लोग मेले में घोड़े लूटने के लिए पहले से तैयारी कर रास्तों में ही नजर बनाए रखते हैं. जैसे ही कोई श्रद्धालु घोड़ा लेकर मंदिर की ओर बढ़ता है,वैसे ही उसे झपटकर ले जाने की होड़ मच जाती है.
दूर-दराज से पहुंचते हैं लोग
इस अनोखी परंपरा को देखने और निभाने के लिए सारण के अलावा मुजफ्फरपुर,वैशाली,पटना,सिवान,गोपालगंज और चंपारण सहित कई जिलों से लोग यहां पहुंचते हैं. सभी धर्मों के लोग इस मेले में भाग लेते हैं,जिससे यह आयोजन सामाजिक समरसता का भी प्रतीक बन गया है.
पूजा-पाठ और आयोजन की विशेषता
सुबह पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम की शुरुआत होती है. पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तन में खीर बनाकर प्रसाद चढ़ाया जाता है,हवन किया जाता है,और इसके बाद घोड़े चढ़ाने व लूटने की प्रक्रिया शुरू होती है. कई श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर स्थायी (सीमेंटेड) घोड़े भी बनवाकर यहां स्थापित कराते हैं.
पर्यटन स्थल बनाने की मांग
स्थानीय लोगों का मानना है कि इस अनोखी परंपरा और मेले को देखते हुए इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए,जिससे क्षेत्र की पहचान और भी बढ़ सके.
यह मेला आस्था और विश्वास का प्रतीक है या अंधविश्वास—यह सवाल अलग-अलग लोगों के नजरिए पर निर्भर करता है. लेकिन एक बात तय है कि बदलते समय के बावजूद यह परंपरा आज भी लोगों के जीवन और विश्वास का अहम हिस्सा बनी हुई है.
छपरा से मनोरंजन पाठक की रिपोर्ट--





