फुसरो नगर परिषद चुनाव : निर्दलीय चेहरों की आड़ में सियासी महासंग्राम, भीतरघात बना सबसे बड़ा खतरा
बेरमो:फुसरो नगर परिषद का चुनाव भले ही पार्टी सिंबल पर नहीं हो रहा हो,लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यह पूरी तरह से राजनीतिक ताकतों की परोक्ष लड़ाई बन चुका है. अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतरे प्रत्याशी निर्दलीय हैं,मगर उनके पीछे खड़ी राजनीतिक पार्टियां इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल मान चुकी हैं.
कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी के पक्ष में बेरमो विधायक खुद मोर्चा संभाले हुए हैं. लगातार कैंपेन और रणनीतिक बैठकों से कांग्रेस खेमे ने चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है. दूसरी ओर बीजेपी+आजसू समर्थित प्रत्याशी के समर्थन में पूर्व सांसद और पूर्व विधायक खुलकर प्रचार में जुटे हैं. उनके सक्रिय होने से चुनावी मुकाबला और तीखा हो गया है. कार्यकर्ताओं में जबरदस्त जोश देखा जा रहा है और बूथ स्तर पर रणनीति को धार दी जा रही है. इधर झामुमो समर्थित प्रत्याशी भी संगठन की ताकत और स्थानीय नेटवर्क के दम पर मुकाबले को पूरी तरह त्रिकोणीय बनाए हुए हैं. झामुमो खेमे का दावा है कि जमीनी पकड़ और वोट ट्रांसफर की रणनीति उन्हें बढ़त दिलाएगी.
भीतरघात की आशंका से बढ़ी बेचैनी
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा“भीतरघात”को लेकर है. कई जगहों पर असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने नहीं आई है,लेकिन अंदरखाने समीकरण बदलने की अटकलें तेज हैं. चुनाव भले निर्दलीय हो,पर वोट ट्रांसफर और व्यक्तिगत रिश्ते इस बार बड़ा खेल कर सकते हैं.
जातीय और स्थानीय समीकरण निर्णायक
फुसरो में जातीय संतुलन,मोहल्ला-वार वोट बैंक और व्यक्तिगत छवि इस बार परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे. बड़े नेताओं की एंट्री से चुनाव का कद बढ़ गया है,लेकिन अंतिम फैसला स्थानीय जनता के मूड पर ही निर्भर करेगा. अब पूरा क्षेत्र चुनावी रंग में रंग चुका है. हर गली,हर चौक पर सियासी चर्चा है. बिना पार्टी सिंबल के हो रहे इस चुनाव में असली परीक्षा नेताओं की पकड़ और संगठन की मजबूती की है. अब देखना है कि फुसरो की जनता किसे अपना भरोसा देती है और किस खेमे की प्रतिष्ठा दांव पर लगती है.
बेरमो से पंकज कुमार की रिपोर्ट--





