कोचिंग पर सख्त सरकार शिक्षा मे होगा सुधार ? : कोचिंग संस्थान उद्देश्य से भटके, सरकार की आंखो में खटके, अब होगी सफाई ?
विद्यार्थियों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए, कोचिंग संचालन को लेकर शिक्षा विभाग को सीएम सम्राट चौधरी की ओर से निर्देशित किया गया है कि विभाग शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन, पारदर्शिता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करे। इसके लिए प्रभावी नियम कानून के साथ नियमन के लिए जरूरी कदम उठाने की कार्रवाई की जाए। गाइडलाइन के तौर पर सीएम ने विभाग को ये सुनिश्चित करने को कहा कि सभी विद्यार्थियों की लिस्ट जिला स्तर पर जमा करायी जाए, साथ ही स्कूल कॉलेज में पढ़ाई के समय कोचिंग के संचालन पर प्रतिबंध रहे। इसके बाद जो जरूरी कदम हों वो उठाए जाए।
बच्चों से जुड़ा है
मामला संवेदनशील है, बच्चों से जुड़ा है, जो किसी भी विषय को लेकर बड़े प्रतिक्रियाशील रहते हैं। खास कर जब विषय को उनके भविष्य से जोड़ कर प्रोजेक्ट किया जाए तो कई बार कठपुतली के तौर पर संस्थानों के संचालकों के निजी हित के लिए उन्हें नचाया जा सकता है।

विषय कोचिंग संस्थानों से जुड़ा है जो शिक्षा के कारोबार के कुछ छोटे और कुछ बड़े स्टेक होल्डर हैं। लाखों करोड़ों के कारोबार के प्रॉफिट मेकिंग ग्रुप होने के साथ प्रचार प्रसार से ज्यादा प्रॉफिट और नेम-फेम वाला फायदातो बोनस की तरह होता है।
सब पैकेज डील में आता है
फिर आते हैं वो पैरेंट्स जो कभी गाढ़ी कमाई लुटा कर, कभी गहने गिरवी रखकर, तो कभी खेत बेच कर, शिक्षा के बाजार में प्रचार के प्रभाव में, भविष्य के सुनहरे सपनों के सम्मोहन में, खींचे चले आते हैं शिक्षा के इस बाजार में। इस बाजार में कोई 100, तो कोई 1000, तो कोई लाख का लेबल लगाए बैठा होता है। बड़ा बैनर, बड़ा नाम, बड़ा दाम, बेहतर रिजल्ट, बच्चों की बल्ले, सब पैकेज डील में आता है। इसके बाद ट्रैक रिकार्ड को कौन ट्रैक करता है, वो तो बस बैनर पोस्टर और प्रचार के प्रभाव में ट्रैप होते नजर आते हैं। लाखों की भीड़ में रेस में दौड़ते बच्चे पिछड़ते हैं, रिजल्ट के दबाव में निराशा हाथ लगने पर हताश होते दिखते हैं, कुछ रास्ता बदलते हैं, कुछ संभलते हैं, तो कुछ भीड़ में गुम हो गुमसुम घर लौटते हैं।
शिकायतों का पहाड़ खड़ा हुआ !
साल दर साल शिकायतों का पहाड़ खड़ा हुआ तो किरकिरी हुई सरकार की आंखो में। चुभन हुई तो छात्र हित का ध्यान आया और आदेश किया गया कोचिंग संस्थानों की मनमानी पर नकेल कसने का, लेकिन कोचिंग संस्थान भी कोई विलेन तो हैं नहीं। सरकारी सुविधा की समुचित व्यवस्था न होने पर खाली स्पेस को वो भर रहे हैं। बच्चों को सेवा दे रहे और बदले में थोड़ा सेवा शुल्क ले रहे हैं। ये अलग बात है कि कुछ संस्थानों के संचालक सेवा और सेवा शुल्क से आगे बढ़ कर, कोचिंग संस्थानों के सजे बाजार में, शिक्षा को बड़ा कारोबार बना कर मेवा खाने में लग गए, और शुरू हुआ संस्थानों के बीच कॉरपोरेट स्टाइल वाला संघर्ष, अपने यहां ज्यादा से ज्यादा बच्चों की लुभाने का और यहीं वो उद्देश्य से भटकते नजर आने लगे। उद्देश्य नहीं भटकना चाहिए नहीं तो स्वभाविक रूप से खटकने लगेंगे और शायद कुछ ऐसा हुआ, कोचिंग संस्थानों के बीच वरचस्व की लड़ाई ऐसे मोच पर आई जहां सरकार की आंखो में बिगड़ते हालात खटकने लगे। तभी तो कार्रवाई की बात हो रही है। ऐसे में हम भी सवाल तो पूछेंगे कि कोचिंग पर सख्त सरकार शिक्षा मे होगा सुधार ?
दीपक कुमार, सीनियर एंकर





