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जलवायु जोखिम के बीच भूजल संरक्षण पर कार्यशाला : PHED मंत्री संजय कुमार सिंह ने जारी की ‘बिहार डायनेमिक ग्राउंड वॉटर रिपोर्ट 2025’

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पटना : बिहार में सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED),राज्य सरकार ने जल शक्ति मंत्रालय,भारत सरकार के केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB)और यूनिसेफ के सहयोग से जलवायु-संवेदनशील भूजल प्रबंधन पर राज्यस्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया.

इस परामर्श बैठक में नीति-निर्माताओं,इंजीनियरों,वैज्ञानिकों और विकास साझेदारों ने भाग लिया और बिहार के भूजल संसाधनों पर उभरते जलवायु जोखिमों पर चर्चा की,जो ग्रामीण पेयजल आपूर्ति का प्रमुख आधार है.

“हर घर नल का जल”योजना के तहत राज्य में1.8करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों तक पाइप जलापूर्ति पहुंचाई गई है,लेकिन विशेषज्ञों ने भूजल के लगातार दोहन,अनियमित वर्षा और कई जिलों में जल स्रोतों के मौसमी रूप से सूखने को लेकर चिंता जताई.

लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री संजय कुमार सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि जल संसाधनों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए सभी विभागों तथा आम लोगों को मिलकर कार्य करना होगा. उन्होंने“हर घर नल का जल”योजना के तहत राज्य में बड़ी संख्या में घरों तक पाइप से पेयजल पहुंचाने को बिहार के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया और कहा कि इससे लोगों के जीवन स्तर और स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और अनियमित वर्षा के कारण भूजल पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में गंभीर चुनौती बन सकती है. इसलिए केवल पेयजल योजनाएं बनाना ही पर्याप्त नहीं है,बल्कि भूजल के संरक्षण के लिए एक्वीफर आधारित योजना,विभागों के बीच बेहतर समन्वय और जल संरक्षण में आम लोगों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी.

मंत्री ने कहा, “पेयजल आपूर्ति और भूजल संरक्षण को साथ-साथ लेकर चलना होगा,तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पर्याप्त जल उपलब्ध रह सकेगा.”उन्होंने विश्वास जताया कि यह कार्यशाला राज्य में जलवायु के अनुरूप,अधिक मजबूत और दीर्घकालिक पेयजल प्रबंधन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. इस अवसर पर मंत्री ने“बिहार राज्य के गतिशील भूजल संसाधन, 2025”की वार्षिक रिपोर्ट का भी विमोचन किया.

अभय कुमार सिंह,प्रमुख अभियंता सह विशेष सचिव,लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED),बिहार सरकार ने कहा कि राज्य में ग्रामीण पेयजल आपूर्ति व्यवस्था में व्यापक विस्तार हुआ है,जिसके तहत1.20लाख से अधिक पाइप जलापूर्ति योजनाएं और6.5लाख चापाकल स्रोत कार्यरत हैं.

उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में भूजल स्तर में गिरावट एक बड़ी चुनौती है,जिससे निपटने के लिए विभाग लगातार निगरानी,समय पर मरम्मत और पूर्व तैयारी पर विशेष ध्यान दे रहा है,ताकि जलापूर्ति बाधित न हो. वहीं उन्होंने विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि पीएचईडी,केंद्रीय भूजल बोर्ड के सहयोग से“जल सुरक्षित पंचायत”विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहा है,जो भविष्य के लिए एक टिकाऊ मॉडल साबित होगा.

अरविंद कुमार (आईएएस),अपर सचिव,लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED),बिहार सरकार ने अपने संबोधन में कहा कि गर्मी के मौसम में लगातार घटते भूजल स्तर की चुनौती को देखते हुए विभाग ने पूरे राज्य में निर्बाध पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय और पूर्व-निवारक रणनीति अपनाई है.

उन्होंने बताया कि8हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में भूजल स्तर की नियमित निगरानी,राज्यव्यापी चापाकल मरम्मत अभियान तथा तकनीकी आकलन के लिए फील्ड टीमों की तैनाती की जा रही है,ताकि संभावित समस्याओं का समय रहते समाधान किया जा सके.

उन्होंने आगे कहा कि आपात स्थितियों से निपटने के लिए जल टैंकर,वाटर एटीएम और24×7सक्रिय कंट्रोल रूम की व्यवस्था की गई है,जिससे शिकायतों का त्वरित निपटान हो सके और सभी को सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके.

राजीव रंजन शुक्ला,क्षेत्रीय निदेशक,केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB),भारत सरकार ने कहा कि“माइनर रिसोर्स”कहे जाने के बावजूद भूजल ही पेयजल का प्रमुख स्रोत बना हुआ है. उन्होंने बताया कि भारत में ग्रामीण पेयजल आपूर्ति का80प्रतिशत से अधिक हिस्सा भूजल पर निर्भर है,जबकि बिहार में इसकी निर्भरता लगभग पूर्ण है. वहीं उन्होंने आगाह किया कि पानी के अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण भूजल स्तर में लगातार गिरावट एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है. साथ ही उन्होंने इस स्थिति से निपटने के लिए सतत और वैज्ञानिक आधार पर भूजल प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया.

कार्यक्रम की भूमिका निर्धारित करते हुए यूनिसेफ बिहार के पेयजल एवं स्वच्छता विशेषज्ञ डॉ. प्रभाकर सिन्हा ने कहा कि सुरक्षित पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित करने और बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए भूजल का सतत प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है. साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि जलापूर्ति प्रणालियों में जलवायु अनुकूलता (क्लाइमेट रेजिलिएंस) को शामिल करना मौजूदा समय की ज़रूरत है.

कार्यशाला में वक्ताओं ने कहा कि भूजल पर बढ़ती निर्भरता और जलवायु परिवर्तन के असर से दीर्घकालिक जल सुरक्षा पर दबाव बढ़ता जा रहा है. कार्यशाला के दौरान चार तकनीकी सत्र आयोजित किए गए,जिनमें वैज्ञानिक पहलुओं के साथ जमीनी अनुभवों पर भी विस्तार से चर्चा हुई—

*भूजल व जलवायु जोखिम: विशेषज्ञों ने राज्य में भूजल की स्थिति का आकलन प्रस्तुत करते हुए जलस्तर में गिरावट और जलवायु जनित दबाव को रेखांकित किया तथा उपयुक्त पुनर्भरण उपाय सुझाए.

*एक्वीफर प्रणाली व जल मांग: इस सत्र में राष्ट्रीय एक्वीफर मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM)के तहत एक्वीफर मैपिंग और विश्वसनीय जलापूर्ति सुनिश्चित करने की चुनौतियों पर विचार-विमर्श हुआ.

*मैदानी अनुभव: विभिन्न केस स्टडी के जरिए तालाब पुनर्जीवन और समुदाय आधारित जल संरक्षण जैसे सफल प्रयासों के साथ-साथ क्रियान्वयन की चुनौतियों को भी सामने रखा गया.

*समन्वित दृष्टिकोण: विभिन्न विभागों एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने डेटा साझा करने,जनभागीदारी बढ़ाने और विभागीय समन्वय को मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की.

कार्यशाला का समापन संबंधित विभागों द्वारा समन्वित प्रयासों के माध्यम से एक ठोस कार्ययोजना बनाने एवं उसके प्रभावी क्रियान्वयन के आह्वान के साथ हुआ. इसमें स्थानीय स्तर की योजनाओं में भूजल संरक्षण को शामिल करने और संस्थागत समन्वय को मजबूत करने पर जोर दिया गया. अधिकारियों ने कहा कि इस विचार-विमर्श से तकनीकी क्षमता बढ़ाने,विभिन्न योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने और पूरे राज्य में दीर्घकालिक,जलवायु-संवेदनशील पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.

विशेषज्ञों ने कहा कि बढ़ते जलवायु दबाव के बीच राज्य के जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए सरकारी एजेंसियों,तकनीकी संस्थानों और यूनिसेफ जैसे विकास साझेदारों के बीच निरंतर सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण होगा.

पटना से राजीव रंजन की रिपोर्ट