'पूर्ण अरण्य' की विरासत : जहाँ आज भी पेड़ों को 'बाबूजी' मानकर पूजते हैं लोग
बिहार का पूर्णिया, जिसे कभी इसके सघन वनों के कारण 'पूर्ण अरण्य' (पूर्णतः जंगल) कहा जाता था, अपनी हरियाली के लिए विश्वविख्यात था। आज से लगभग दो सौ साल पहले (1809-10 में) जब प्रसिद्ध *अन्वेषक फ्रांसिस बुकानन* यहाँ पहुंचे थे, तो उन्होंने यहाँ की सभ्यता और संस्कृति का बहुत बारीकी से अवलोकन किया था।अपनी *'पूर्णिया रिपोर्ट'* में बुकानन ने लिखा था कि यहाँ के लोगों के लिए वृक्षारोपण करना केवल एक शौक नहीं, बल्कि एक धार्मिक प्रतिबद्धता थी। उस समय लोग अपने घरों से कुछ दूरी पर अनिवार्य रूप से पेड़ लगाते थे और ज़रूरत पड़ने पर भी लकड़ी का उपयोग बहुत सीमित मात्रा में ही करते थे।

बदलता दौरऔर कंक्रीट का विस्तार समय के साथ विकास की अंधी दौड़ और पर्यावरण के प्रति हुई अनदेखी ने 'पूर्ण अरण्य' के स्वरूप को बदल दिया। आज पूर्णिया के शहरी क्षेत्र कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन संतोष की बात यह है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी यह प्राचीन संस्कृति जीवित है।

साहित्यकार गिरीन्द्र नाथ झा बताते हैं कि आज भी पूर्णिया के गाँवों में लोग पेड़ लगाने की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। वे पेड़ों को घर का अभिभावक मानते हैं और समय-समय पर इनकी पूजा भी करते हैं।

आस्था और पर्यावरण का अनूठा संगम ग्रामीण क्षेत्रों में पेड़ों के प्रति भावनात्मक जुड़ाव अद्भुत है। यहाँ की महिलाएँ बताती हैं कि वे संकट के समय इन पुराने पेड़ों के पास जाकर अपनी मन्नतें माँगती हैं। उनके लिए ये 'बूढ़े पेड़' परिवार के किसी बुजुर्ग या बाबूजी की तरह हैं, जो संकट के समय सुरक्षा की छाया प्रदान करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह सीख उन्हें पूर्वजों से मिली है कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए घर और खेत में पेड़ों का होना अनिवार्य है।
जे पी मिश्रा के साथ कशिश न्यूज़ डेस्क