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BIHAR NEWS : बिहार में नेत्रदान को लेकर जागरूकता की कमी और सामाजिक मिथक बड़ी चुनौती, अंतिम समय में 90 प्रतिशत परिवार सहमति से पीछे हट जाते हैं

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पटना में नेत्रदान को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने सामाजिक जागरूकता की कमी को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार में नेत्रदान के लिए काउंसलिंग किए जाने वाले परिवारों में करीब 90 प्रतिशत मामलों में अंतिम समय पर सहमति टूट जाती है। इसके पीछे रिश्तेदारों का विरोध, अधूरी जानकारी और सामाजिक मिथकों को प्रमुख कारण बताया गया है।आईजीआईएमएस स्थित बिहार राज्य नेत्र अधिकोष में हर माह नेत्रदान के इच्छुक परिवारों की काउंसलिंग की जाती है। लेकिन कई परिवार अंतिम समय में नेत्रदान का निर्णय बदल देते हैं। परिवारों के बीच यह धारणा अब भी मौजूद है कि मृत्यु के बाद आंखें दान करने से मृत व्यक्ति का चेहरा बिगड़ सकता है या अगले जन्म में अंधापन हो सकता है। ऐसी मान्यताएं जरूरतमंद लोगों तक नेत्रदान के जरिए रोशनी पहुंचाने में बड़ी बाधा बन रही हैं।

हालांकि, बिहार में नेत्रदान को लेकर धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में राज्य में सिर्फ छह नेत्रदान हुए थे। वर्ष 2023 तक यह संख्या बढ़कर 229 पहुंच गई। विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को सही जानकारी देकर और सामाजिक मिथकों को दूर करके नेत्रदान की संख्या में काफी वृद्धि की जा सकती है।परिवारों ने अपनों की मृत्यु के बाद नेत्रदान कर मानवता की मिसाल पेश की है। क्षेत्रीय चक्षु संस्थान के चीफ डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा समेत कई लोगों के परिवारों ने भी नेत्रदान कराया है। नेत्रदान से किसी की यादें और आंखों की रोशनी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी में उजाला ला सकती हैं।