BIHAR NEWS : पटना हाईकोर्ट ने एक सरकारी कर्मी को दी गई सजा किया निरस्त

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Patna : पटना हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी भी सरकारी कर्मियों को एक साथ छोटी और बड़ी सजा नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने कर्मी को दी गई सजा को निरस्त कर दिया.

जस्टिस संदीप कुमार ने डीएसपी मनोज कुमार सुधांशु की ओर से दायर अर्जी पर सुनवाई की.कोर्ट को बताया गया कि आवेदक 45वीं बीपीएससी परीक्षा पास कर डीएसपी बना और उनकी पोस्टिंग भागलपुर के कहलगांव में एसडीपीओ के पद पर हुई.

उन्हें ओवरलोडिंग और अवैध खनन को लेकर कहलगांव थाना कांड संख्या 337/2018 की पूरक जांच का जिम्मा सौंपा गया. डीएसपी पर ये आरोप लगाया गया कि छापेमारी के दौरान कई बैंक खाता पासबुक,नकदी और अन्य वस्तुएं को जब्त की गईं. अभियुक्तों के बैंक खातों को डीफ्रीज करने के लिए ट्रायल कोर्ट को अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्रस्तुत किया गया और एनओसी के आधार पर अभियुक्तों के खाते डीफ्रीज कर दिए गया.

डीएसपी पर आरोप है कि अवैध राशि को जब्त करने के लिए उचित कदम उठाने में विफल रहे. उसने एक एनओसी जारी कर दी,जिसके कारण धनराशि जारी हो गई.

ऐसी अनियमितताओं,कर्तव्य में लापरवाही और संदिग्ध आचरण को लेकर आवेदक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई. भागलपुर के डीआईजी ने 26 फरवरी,2019 को एक प्रारंभिक जांच की.

इसमें आवेदक को पूरक जांच अनियमित रूप से करने का दोषी पाया. इसके बाद पुलिस महानिरीक्षक (मुख्यालय) ने 27 फरवरी,2019 को निलंबन की सिफारिश की. गृह विभाग ने 6 जून,2019 को पुलिस महानिदेशक ने आवेदक के खिलाफ आरोप पत्र का मसौदा मांगा.

भागलपुर के डीआईजी ने 1 जुलाई,2019 को आवेदक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने के लिए आईजी,मुख्यालय को अपनी सिफारिश भेजी. विभाग ने आवेदक को पांच वार्षिक वेतन वृद्धि रोक दी और इसके अतिरिक्त आवेदक की पदोन्नति पर नियत तिथि से पांच वर्षों के लिए रोक लगा दी गई.

इस आदेश की वैधता को आवेदक ने हाईकोर्ट में चुनौती दी. आवेदक की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सेवा कानून के तहत संयुक्त दंड अस्वीकार्य हैं.

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ सजा के आदेश में संशोधन करते समय अनुशासनात्मक प्राधिकारी एक साथ बड़ी और छोटी दोनों सजाएं नहीं दे सकते.

कोर्ट ने कहा कि बिहार लोक सेवा आयोग ने प्रस्तावित सजा से सहमति जताते हुए बड़ी और छोटी सजाओं को एक साथ देने के कारणों का उल्लेख नहीं किया. कोर्ट ने आवेदक के खिलाफ पारित सजा के आदेश को निरस्त कर दिया.