KASHISH EXCLUSIVEमंत्री जी ने पुलिस पर फोड़ा ठीकरा : शराबबंदी की सफलता पर उठे सवाल तो पुलिस पर उठायी उंगली !
लत लक्षण बाय तीनो मरले पर जाए लेकिन नीतीश कुमार ने प्रयास किया कि बिहार के लोगों की शराब की लत दूर की जाए नशे में धुत शराबियों के जो लक्षण दिखते हैं जिसकी वजह से परिवार में क्लेश हुआ करता था सड़क पर शराबियों का उत्पात दिखता था गलियों में नालियों में बेसुध पड़े लोग नजर आते थे जो कमाई का अधिकांश हिस्सा परिवार की परवरिश में खर्च करने के बजाए शराब पीने में खर्च कर अपना भी बेड़ा गर्क करते थे उनके लक्षण में सुधार हो इसका प्रयास नीतीश कुमार ने किया। बिहारियों को इस बाय यानि बुरी आदत से बचाने के लिए नीतीश कुमार ने सरकारी खजाने पर पड़ने वाला भार स्वीकार किया और शराबबंदी लागू कर दिया। नीतीश कुमार ने बिहारवासियों को मरने से पहले शराब के लत लक्षण और बाय से छुटकारा दिलाने के लिए करीब 3150 करोड़ का नुकसान बर्दाश्त किया।
आंकड़ो से समझे कितना महंगा पड़ा फैसला
आंकडो की बात करें तो 2010-11 में एक्साइज़ ड्यूटी से 1,523 करोड़ रुपये खजाने में आया, जो 2014-15 में बढ़कर 3,217 करोड़ हो गया। हालांकि 2016 में शराबबंदी के बाद एक्साइज ड्यूटी शून्य हो गया, शराबबंदी के बाद सरकार के कर राजस्व में गिरावट हुई। 2014-15 में कर राजस्व आय के स्रोतों का 21.99% था, 2024-25 में कर राजस्व घट कर 18.81 फ़ीसदी रह गया और 2026-27 के बजट में कर राजस्व 18.92% रहने का अनुमान जताया गया है।
इतने कर में नुकसान के बाद भी समय के साथ समाज खास कर निचले तबके में शराबबंदी का सकारात्मक असर दिखने लगा। पुलिस रिकार्ड और दूसरे माध्यमों से मिलने वाले आंकड़ो से पता चला कि शऱाबबंदी के बाद नशे में परिवार की महिलाओं से मारपीट, कलह कम होने लगी, हिंसा, अपराधिक घटनाओं में कमी आई। पहले शराब के लत के कारन कमाई का जो बड़ा हिस्सा पैमाना छलकाने में बर्बाद होता था वो बच्चों की पढ़ाई-परवरिश में काम आने लगा। घर परिवार में खुशियां आई नीतीश के नाम एक और चुनावी वादा पूरा करने का श्रेय जुड़ा और ये सिर्फ सियासी नहीं, समाज सुधार कि दिशा में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार का बड़ा प्रयास था। इसकी सफलता के शुरुआती लक्षण जल्द दिखने लगे लेकिन साथ ही शुरू हुआ शराब का अवैध कारोबार।

शराबबंदी से बढ़ा अवैध कारोबार !
जिन पाउच और बोतलों की बिक्री से सिर्फ सरकारी खजाने को 3000 करोड़ से अधिक की आय हो, उसका बाजार कुछ नहीं तो 6000 करोड़ का जरूर रहा होगा और इतनी बड़ी राशि के लेन देने से जुड़े लोग अचानक से सब बंद कर फांका-कशी से संतोष कर लें ये संभव नहीं। तो फिर शुरू हुआ और बढता ही चला गया शराब बंदी के बाद बिहार में शराब का अवैध कारोबार हेरा फेरी करने वालों को संरक्षण देने में सरकारी व्यवस्था में शामिल लोगों पर आरोप लगा चाहे खाकी वाले हों या खादी वाले लेकिन शराबबंदी के 10 साल बाद इसकी सफलता पर सवाल उठ रहे हैं। समीक्षा की बात हो रही है। यहां तक कि इसे खत्म करने की भी मांग होती रही है।
शराबबंदी पर सवाल, वर्दी वालों पर ठीकरा !
ऐसे में मंत्री मदन सहनी ने शराबबंदी की सफलता पर उठते सवाल का ठीकरा मद्य निषेध विभाग की टीम के संख्या बल से लेकर सहयोगी पुलिस पर फोड़ा है। विभागीय टीम को कार्रवाई में पुलिस से सही और पर्याप्त सहयोग मिले इसे जरूरी बताया गया। सहयोग के लिए अपील भी करने की बात कह रहे हैं। कशिश न्यूज के साथ खास बातचीत में मंत्री मदन सहनी ने शराब की अवैध बिक्री और तस्करी पर चिंता जताते हुए डीजीपी को पत्र लिखकर अधिक सहयोग की मांग करने की बात कही है। इसके बाद भी सवाल तो बनता है कि क्या वाकई में पुलिसकर्मियों की वजह से शराबबंदी प्रभावी नहीं हो रहा, या विभाग की टीम कम है, कमजोर है या सरकार की इच्छाशक्ति में कमी है ?
दीपक कुमार, सीनियर एंकर