झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : धारा 188 में निजी शिकायत पर संज्ञान नहीं, बरियातू थाना में दर्ज आपराधिक मामला को किया निरस्त
रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनते हुए बारीयातू थाना कांड संख्या 200/2017 में दर्ज पूरे आपराधिक मामले को निरस्त कर दिया है. अदालत ने साफ कहा कि कानूनी प्रक्रिया और आवश्यक तत्वों के अभाव में किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई जारी नहीं रखी जा सकती.
न्यायमूर्ति अनिल कुमार की अदालत ने बारीयातू थाना कांड संख्या 200/2017 से उत्पन्न संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को निरस्त (Quash)कर दिया है. यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC)की धाराओं 143,188,504,506 एवं 384 के तहत दर्ज किया गया था. वहीं अभियुक्त की तरफ से कोर्ट के समक्ष अधिवक्ता सूरज किशोर प्रसाद ने पक्ष रखा.
धारा 188 पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 188IPCके तहत किसी भी मामले में सीधे निजी शिकायत (Private Complaint)के आधार पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)की धारा 195(1)(a)इसके लिए स्पष्ट कानूनी बाधा उत्पन्न करती है.
क्या है धारा 188IPC?
धारा 188IPCलोक सेवक द्वारा जारी आदेश की अवहेलना से संबंधित है. यदि कोई व्यक्ति ऐसे आदेश का उल्लंघन करता है जिससे जन-शांति,सुरक्षा या मानव जीवन को खतरा हो सकता है,तो उस पर कार्रवाई की जाती है.
हालांकि,इस धारा में संज्ञान केवल संबंधित लोक सेवक या अधिकृत अधिकारी की लिखित शिकायत पर ही लिया जा सकता है.
धारा 384 (जबरन वसूली) भी नहीं टिक पाई
न्यायालय ने पाया कि जबरन वसूली (Extortion)के आरोप को साबित करने के लिए जरूरी“मांग (Demand)”का तत्व अभिलेख पर मौजूद नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि बिना मांग के जबरन वसूली का अपराध स्थापित नहीं किया जा सकता,इसलिए यह आरोप भी टिकाऊ नहीं है.
सभी आरोपों को किया गया निरस्त
इन सभी कानूनी पहलुओं और तथ्यों पर विचार करते हुए न्यायालय ने पूरे मामले की आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया.
कानूनी प्रक्रिया पर फिर लगा जोर
यह फैसला एक बार फिर इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और आवश्यक तत्वों के अभाव में किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती.
रांची से राहुल कुमार की रिपोर्ट--