फर्क होता है पुलिस और अपराधी में! : अपराध पर एक्शन का क्या एनकाउंटर ही ऑपशन है ?
फर्क होता है किसी की हत्या और वध में। फर्क हथियार में नहीं होता। फर्क होता है हथियार को थामने वाले हाथ में। हथियार को चलाने वाली सोच में और फर्क होता है हथियार चलाने वाले हाथ को नियंत्रत करने वाली सोच के पीछे की मंशा में। स्वार्थ के लिए या समाज के लिए, सरकार के आदेश पर, कानून तोड़ने के लिए या कानून की रक्षा के लिए, आम जनो की सुरक्षा के लिए, कहर बरपाने के लिए या फर्ज निभाने के लिए, हथियार चलाने में फर्क होता है।
सवालों के दायरे में पुलिस
यही फर्क वो फासला है जो बताता है कि पुलिस कौन और अपराधी कौन। जबकि हथियार दोनो रखते हैं और दोनो ही चलाते हैं, लेकिन जब अपराध नियंत्रण के नाम पर पुलिस नियंत्रण में न रहे, सरकार से मिली छूट को कानून के दायरे से छूट निकलने का परमिट मानते हों, तो पुलिस वाले भी कानून के दायरे की देहरी पार कर सवालों के दायरे में आ जाते हैं।
अपराध पर एक्शन का एनकाउंटर ही ऑपशन ?
सवाल तब उठते हैं जब अपराध नियंत्रण के लिए हथियार का उपयोग संदेह के दायरे में आ जाता है। आरोप लगते हैं कि पुलिस इंकाउटर का प्रयोग कर रही है कभी अपनी छवी सुधारने के लिए, कभी स्वार्थ के लिए। कभी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए तो कभी पद की हनक दिखाने के लिए। कभी अपने अहम की संतुष्ठी के लिए तो कभी सरकार की सराहना के लिए, न कि कानून और समाज की रक्षा के लिए हथियार का प्रयोग करते हैं।
ऐसे में यादा आता है फिल्मी पुलिस का फिल्मी डायलाग नो FIR, नो टॉक फैसला ऑन द स्पॉट। तो ऐसे में कोर्ट कचहरी जज वकील क्या करने के लिए हैं? जब फैसला पुलिस ऑन द स्पाट करने लगेगी? समस्या तभी होती है और सवाल तभी उठता है ऐसे में हम भी सवाल तो पूछेंगे कि अपराध पर एक्शन का क्या एनकाउंटर ही ऑपशन है।
दीपक कुमार शर्मा, सीनियर एंकर