झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : बुजुर्ग माता-पिता को प्रताड़ित करने पर घर से बाहर होंगे बेटे और बहू
रांची:झारखंड उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि बुजुर्ग माता-पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है,तो उनके स्वयं की कमाई से बने मकान में बेटा और बहू जबरन नहीं रह सकते,कोर्ट ने यह भी कहा है कि उत्तराधिकार का अधिकार भविष्य से जुड़ा होता है,इससे संपत्ति पर तत्काल स्वामित्व नहीं मिल जाता है.
न्यायमूर्ति राजेश कुमार की अदालत ने रामगढ़ उपायुक्त द्वारा23फरवरी2024को पारित आदेश को निरस्त करते हुए बुजुर्ग दंपति की याचिका स्वीकार कर ली है. अदालत ने माना है कि संबंधित मकान वरिष्ठ नागरिकों की स्व-अर्जित संपत्ति है,इसलिए उस पर उनका पूर्ण अधिकार है. ऐसे में यदि उनके साथ दुर्व्यवहार होता है और साथ रहना संभव नहीं रह जाता,तो संपत्ति पर उनका शांतिपूर्ण कब्जा सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन देना है. यदि परिवार के सदस्य ही उनके लिए परेशानी का कारण बन जाएं,तो प्रशासन और न्यायालय का दायित्व है कि उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाए. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन के अंतिम पड़ाव में वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान,सुरक्षा और मानसिक शांति मिलना उनका अधिकार है.
रामगढ़ जिले के निवासी75वर्षीय लखन लाल पोद्दार और उनकी72वर्षीय पत्नी उमा रानी पोद्दार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. दंपती का आरोप था कि उनका बेटा जीतेन्द्र पोद्दार और बहू रितु पोद्दार उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं और उन्हें अपने ही घर में चैन से नहीं रहने देते.
बताया गया कि वर्ष2022में दंपती ने मेंटेनेंस अधिनियम के तहत अनुमंडल पदाधिकारी (SDM)के समक्ष आवेदन दिया था.23नवंबर2022कोSDMने आदेश दिया था कि बेटा और बहू मकान खाली करें. हालांकि,इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई,जिसके बाद रामगढ़ उपायुक्त ने23फरवरी2024कोSDMके आदेश में बदलाव करते हुए बेटे-बहू के पक्ष में निर्णय दे दिया.
उपायुक्त के इस आदेश को चुनौती देते हुए बुजुर्ग दंपती ने फिर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की. सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने उपायुक्त का आदेश रद्द कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि स्व-अर्जित संपत्ति पर वरिष्ठ नागरिकों का अधिकार सर्वोपरि है. इस फैसले को बुजुर्गों के अधिकारों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.
रांची से नैयर की रिपोर्ट---