चतरा के 30 गांव डिजिटल युग से कोसों दूर
लोग घंटों पेड़ों पर चढ़कर नेटवर्क तलाशते,गुरूजी हाजिरी के लिए पहाड़ का सहारा ले रहे
चतरा: डिजिटल इंडिया के दौर में जहां देश 5G की तरफ बढ़ रहा है, वहीं चतरा में कई गांव के लोग आज भी नेटवर्क के लिए पेड़ों और पहाड़ों पर चढ़ने को मजबूर हैं. जिले के कुंदा प्रखंड के 78 गांवों में से करीब 30 गांव आज भी डिजिटल ब्लैकआउट में जीने को विवश है.
वहीं, प्रतापपुर प्रखंड के कुटिल, मरगड़ा, एकता और दारी जैसे गांवों में मोबाइल सिर्फ एक खिलौना बनकर रह गया है. लावालौंग प्रखंड के करीब 20 गांवों की स्थिति कुछ ऐसी है जहां फोन कॉल करना किसी चुनौती से कम नहीं. लोग घंटों पहाड़ों और पेड़ों पर चढ़कर सिग्नल तलाशते हैं.
नेटवर्क की कमी ने शिक्षा व्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. प्रतापपुर के बामी गांव के स्कूल में डिजिटल क्लास पूरी तरह ठप हो गई है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि शिक्षक को अपनी ऑनलाइन हाजिरी बनाने के लिए स्कूल छोड़कर पहाड़ पर जाना पड़ता है. अगर नेटवर्क मिल गया तो हाजिरी लगती है, नहीं तो गैरहाजिर.
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है. मेडिकल इमरजेंसी में एम्बुलेंस बुलाना भी यहां किसी जोखिम से कम नहीं है. ग्रामीण बताते हैं कि फोन करने के लिए उन्हें पेड़ या पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है. हैरानी की बात यह है कि इलाके में बीएसएनएल के टॉवर तो लगे हैं, लेकिन वे काम नहीं कर रहे.
इस मुद्दे पर बीएसएनएल के अधिकारियों का कहना है कि जंगल क्षेत्रों में केवल 700 MHz बैंड लगा है, जबकि बेहतर नेटवर्क के लिए 2100 MHz जरूरी है.
चतरा विधायक जनार्दन पासवान ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए जल्द समाधान का आश्वासन तो दिया है, लेकिन अब देखने वाली बात होगी की कब तक लोगों को इस समस्याओं से निजात मिलता है.
नक्सलवाद के साए से बाहर निकल चुका चतरा अब विकास का हक मांग रहा है. सवाल यह है कि क्या ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना इन गांवों तक पहुंचेगा ? क्या गुरुजी को हाजिरी के लिए पहाड़ पर चढ़ना बंद होगा ?क्या मरीजों को समय पर एम्बुलेंस मिल पाएगी ? ये सवाल आज चतरा के हर गांव, हर परिवार की जुबान पर है.
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