कर्ज देने में कंजूस बैंकों का इलाज है क्या? सरकार की फटकार के बाद भी लोन देने में आनाकानी करते हैं बैंक

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PATNA:-साल दर साल बैंकों का रवैया क्यों नहीं सुधर रहा है? बिहार के लोगों का पैसा जमा होता है, बिहार के लोगों को कर्ज देने में कंजूसी क्यों करते हैं बैंक? आखिर सरकार की फटकार का भी बैंकों पर असर क्यों नहीं होता है? कर्ज देने में कंजूस बैंकों का इलाज है क्या? ये सवाल इसीलिए क्योंकि बिहार में बैंकों का रवैया पिछले कई सालों से सुधरने को तैयार नहीं है। राज्य के बैंक लोगों से डिपॉजिट लेने में जितने तत्पर रहते हैं, उस अनुपात में लोन देने में उतनी उदारता नहीं दिखाते हैं. पिछले 10 वर्षों में बैंकों के लोन देने की रफ्तार में महज 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.।

एक बार फिर गुरुवार को राज्यस्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक हुई, जिसमें डिप्टी सीएम ने लोन देने में सुस्ती पर नाराजगी जाहिर की। पिछले साल सीएम नीतीश ने भी राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की 72वीं समीक्षा बैठक में लोन देने के मामले में लगातार फिसड्डी रहे बैंकों की क्लास ली थी। लेकिन सरकार की ओर से बैंकों की क्लास लेने का ये सिलसिला नया नहीं है। हर साल बैंकर्स समिति की बैठक होती है और हर साल सरकार बैंकों को लोन देने में तेजी लाने को कहती है लेकिन फिर भी बैंक हैं कि सुधरने को तैयार नहीं। गुरुवार को भी पटना में बैंकर्स समिति के साथ डिप्टी सीएम तारकिशोर प्रसाद की अगुआई में सरकार की बैठक हुई और फिर डिप्टी सीएम की ओर से बैंकों को फिर से लोन देने में तेजी लाने को कहा गया।
लेकिन सरकार के बार-बार कहने पर भी लोगों को बैंक लोन देने में कंजूसी करते हैं। सरकार हर साल बैंकों को लोन देने में तेजी लाने को कहती है और बैंक उस अपील को अनसुना करते हैं। जिसकी तस्दीक आंकड़े भी करते हैं।
बिहार में बैंकों के कर्ज देने की रफ्तार बेहद कम है। लोगों से डिपॉजिट लेने में तत्पर रहते हैं बैंक लेकिन उस अनुपात में लोन देने में उदारता नहीं दिखाते। बैंक जिस अनुपात में बिहार के लोगों से पैसे जमा ले रहे हैं। उसमें 40 से 45 प्रतिशत राशि ही बिहार के लोगों को लोन देते हैं। बाकी पैसे से दूसरे राज्य में लोन या अन्य कारोबार करते हैं। पिछले 10 वर्षों में लोन देने की रफ्तार में सिर्फ 12 % की बढ़ोतरी हुई। 2010-11 में बैंकों में लोगों ने एक लाख 12 हजार करोड़ रुपये जमा किये। इसकी तुलना में बैंकों ने मात्र 38,723 करोड़ रुपये का लोन दिया। 2010-11 में सीडी रेशियो (साख-जमा अनुपात) 33.99 प्रतिशत था। 10 साल बाद 2020-21 में बैंकों में डिपॉजिट तीन लाख 96 हजार 471 करोड़ हुआ। लेकिन 2020-21 में एक लाख 75 हजार 474 करोड़ रुपये का ही लोन बांटा गया। 2020-21 में सीडी रेशियो महज 46.40 प्रतिशत रहा। 10 सालों में सीडी रेशियो में महज 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जबकि तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात जैसे विकसित राज्यों का सीडी रेशियो 100 से 130 % है।

इन राज्यों में बिहार जैसे राज्यों के डिपॉजिट से ही लोन बांटे जाते हैं। बिहार में 15 जिलों में सीडी रेशियो 40 प्रतिशत से भी कम है। 40 % सीडी रेशियों के साथ राजधानी पटना भी फिसड्डी है। पटना की बैंक शाखाओं में सबसे ज्यादा एक लाख 26 हजार 55 करोड़ रुपये जमा हैं। इसकी तुलना में बैंकों ने महज 49 हजार 443 करोड़ रुपये का ही लोन बांटा है। जबकि पटना में सबसे ज्यादा आर्थिक गतिविधियां होती हैं। सिर्फ एक जिला पश्चिमी चंपारण में सीडी रेशियो सबसे ज्यादा 60.33 % है। मुंगेर में सीडी रेशियो सबसे कम 28.04% है। राष्ट्रीय स्तर पर बैंकों का सीडी रेशियो 75 % है । जबकि बिहार में बैंकों का सीडी रेशियो सिर्फ 45.68 % है।
साफ है सरकार की हर अपील बैंकों पर बेअसर साबित हो रही है और बिहार के लोगों के जमा पैसे के बदले बिहार के लोगों को लोन देने के बजाए दूसरे राज्यों में बैंक अपना कारोबार कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी है बैंकों पर सरकार को और सख्ती बरतने की। जिससे छोटे छोटे व्यवसाय के लिए लोगों को लोन मिल सके और लोगों को रोजगार मिल सके ताकि बिहार में और तेजी से विकास हो सके।

सुमित झा,कशिश न्यूज