झारखंड की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी और दिलचस्प खबर सामने आ रही है। स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों को फिर से शिक्षा से जोड़ने के अभियान में जहां एक तरफ कई जिले लापरवाही बरत रहे हैं, वहीं रांची ने समय पर जवाब देकर एक बेहतरीन मिसाल कायम की है।झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद यानी जेईपीसी (JEPC) ने स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए घर-घर और कार्यस्थल सर्वेक्षण का निर्देश दिया था।
सर्वे की समय-सीमा: यह अभियान 7 जुलाई से 7 सितंबर 2026 तक चलाया जाना था।
लापरवाही पर एक्शन: काम की धीमी रफ्तार और तय समय पर रिपोर्ट न मिलने पर जेईपीसी ने राज्य के 14 जिलों के अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
रांची बना मिसाल: खास बात यह है कि समीक्षा के बाद स्पष्टीकरण मांगे जाने पर रांची ने समय पर जवाब दिया, जबकि अन्य किसी भी जिले ने निर्धारित समय में जवाब देना जरूरी नहीं समझा।परिषद ने इसे जानबूझकर की गई अनदेखी और नियमों का उल्लंघन माना है।
अंतिम चेतावनी: संबंधित अधिकारियों को 28 सितंबर तक हर हाल में जवाब राज्य मुख्यालय को भेजने का अंतिम मौका दिया गया है।
कड़ी कार्रवाई की तैयारी: राज्य परियोजना निदेशक शशि रंजन ने स्पष्ट किया है कि तय समय-सीमा तक जवाब नहीं मिलने पर फाइल प्रशासनिक कार्रवाई के लिए सीधे शिक्षा विभाग को भेज दी जाएगी।
सिर्फ सर्वे ही नहीं, बल्कि कई अन्य मामलों में भी जिलों से जवाब तलब किया गया है:
ड्रॉप बॉक्स की अनदेखी: जिलों के अपर जिला समन्वयक (एसीपी) द्वारा यू-डाइस ड्रॉप बॉक्स का सत्यापन न कराना।
कागजों पर 100% प्रगति: 16 सितंबर की समीक्षा में चौंकाने वाला सच सामने आया। जिलों ने बैठकों और आयोजनों के आंकड़ों में 100 प्रतिशत प्रगति दिखाई थी—यानी कागजों पर सब कुछ परफेक्ट था।
हकीकत की तस्वीर: लेकिन जब जमीनी हकीकत टटोली गई, तो वास्तविक नामांकन में भारी कमी पाई गई और कई बच्चे अब भी स्कूल से बाहर ही मिले।
स्पष्ट है कि कागजी घोड़े दौड़ाने से बच्चों का भविष्य नहीं सुधरेगा। जहां एक ओर रांची जिला प्रशासन ने जिम्मेदारी निभाते हुए समय पर जवाब दिया है, वहीं अन्य जिलों को भी अब प्रशासनिक सख्ती से सबक लेने की जरूरत है।
