क्या कागजों पर शिक्षा सुधार के दावे केवल दिखावा हैं? झारखंड में स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन इस अभियान में भारी लापरवाही बरतने पर झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद—यानी JEPC—ने राज्य के 14 जिलों के जिम्मेदार अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। खास बात यह है कि इस पूरी लापरवाही के बीच राजधानी रांची ने समय पर जवाब देकर एक बेहतरीन मिसाल कायम की है। लेकिन रांची को छोड़कर बाकी किसी भी सुस्त जिले ने समय पर जवाब तक देना मुनासिब नहीं समझा। परिषद ने इसे जानबूझकर की गई अनदेखी और नियमों का खुला उल्लंघन माना है। आइए जानते हैं कि पूरा मामला क्या है। JEPC ने 2 जुलाई 2026 को एक आदेश जारी कर 7 जुलाई से 7 सितंबर के बीच घर-घर सर्वेक्षण, कार्यस्थल सर्वेक्षण और यू-डाइस ड्रॉप बॉक्स में दर्ज बच्चों के सत्यापन का निर्देश दिया था। काम की धीमी रफ्तार को देखते हुए 27 अगस्त को दोबारा स्पष्टीकरण मांगा गया, लेकिन रांची के अलावा किसी अन्य जिले ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और चौंकाने वाली बात यह है, दर्शकों! 16 सितंबर को जब राज्य स्तर पर समीक्षा हुई, तो पोल खुल गई। कागजों पर तो बैठकों और अभिभावक-शिक्षक संवाद की प्रगति 100 प्रतिशत दिखाई गई थी—यानी सब कुछ परफेक्ट! लेकिन जब जमीन पर हकीकत टटोली गई, तो वास्तविक नामांकन में भारी कमी मिली और बच्चे आज भी स्कूलों से बाहर भटक रहे हैं।

अब शिक्षा परियोजना परिषद ने इन लापरवाह अधिकारियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। संबंधित जिला शिक्षा पदाधिकारी और जिला शिक्षा अधीक्षक को 28 सितंबर तक हर हाल में मुख्यालय को जवाब उपलब्ध कराने का अंतिम मौका दिया गया है।

चेतावनी साफ है! अगर तय समय-सीमा यानी 28 सितंबर तक जवाब नहीं मिला, तो प्रशासनिक कार्रवाई के लिए फाइल सीधे शिक्षा विभाग को भेज दी जाएगी। इसके अलावा, अपर जिला समन्वयकों द्वारा यू-डाइस ड्रॉप बॉक्स का सत्यापन न करने और NIOS में नामांकन की सूची न देने पर भी कड़ा जवाब तलब किया गया है।भुरकुंडा में 14 लाख की लागत से बने उस आंगनबाड़ी भवन का मामला हो, जहां चारदीवारी न होने से स्मार्ट टीवी चोरी हो गया, या फिर इन 14 जिलों की सुस्ती—यह साफ दिखाता है कि प्रशासनिक उदासीनता कैसे बच्चों के भविष्य पर भारी पड़ रही है।

सवाल यह है कि क्या कागजी आंकड़ों का यह खेल अब बंद होगा? 28 सितंबर की आखिरी तारीख नजदीक है, और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रशासन नींद से जागेगा या फिर होगी बड़ी कार्रवाई।