Patna : पटना हाईकोर्ट ने खगड़िया पुलिस द्वारा बिना लिखित कारण के शिक्षक को गिरफ्तार किए जाने पर सख्त नाराजगी जाहिर की. कोर्ट ने कहा कि ऐसा करके सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और संवैधानिक अधिकारों की धज्जियाँ उड़ायी गई.
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस अंशुल की खंडपीठ ने खगड़िया जिले के चित्रगुप्त नगर थाने में दर्ज एक मामले में पुलिस की गंभीर लापरवाही और मनमानी पर कड़ा रुख अपनाया. कोर्ट ने एसपी और दारोगा से ऑनलाईन पूछताछ की.
ये मामला मुजफ्फरपुर जिले के साहेबगंज स्थित सरकारी हाई स्कूल के शिक्षक दिव्य प्रकाश की पत्नी (भवानी कुमारी, जो खगड़िया सदर अस्पताल में बतौर नर्सिंग स्टाफ कार्यरत थीं, द्वारा 12 फरवरी, 2026 को कथित तौर पर आत्महत्या किये जाने का है. इस संबंध में चित्रगुप्त नगर थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 108/3(5) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई.
05 जून, 2026 को चित्रगुप्त नगर पुलिस ने दिव्य प्रकाश को खगड़िया सिविल कोर्ट परिसर के बाहर से गिरफ्तार कर लिया. इसके खिलाफ शिक्षक के पिता शशि भूषण प्रसाद सिंह ने पटना हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर कर गिरफ्तारी को असंवैधानिक घोषित करने और मुआवजा देने की मांग की.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने दलील दी कि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय अभियुक्त को लिखित में गिरफ्तारी का कारण नहीं सौंपा, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) तथा BNSS और CrPC की धाराओं का सीधा उल्लंघन है. पुलिस ने एक 'टेम्पलेट/रेडीमेड अरेस्ट मेमो' का इस्तेमाल किया, जिसमें महज खानापूरी की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों (मिहिर राजेश शाह, विहान कुमार, और राजेंद्र राजन मामले) का हवाला देते हुए अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि केवल एक औपचारिक अरेस्ट मेमो पकड़ा देना संवैधानिक अधिकारों का अनुपालन नहीं माना जा सकता.
एसपी और दरोगा ऑनलाइन तलब किये गए. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल खगड़िया के पुलिस अधीक्षक पुष्कर आनंद और चित्रगुप्त नगर थाने की सब-इंस्पेक्टर ज्योत्सना कुमारी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया.
खगड़िया एसपी ने कोर्ट के समक्ष स्वीकार किया कि गिरफ्तारी के वक्त आरोपी को कोई लिखित आधार नहीं दिया गया था. जांच अधिकारी का मानना था कि चूंकि कोर्ट से वारंट जारी था, इसलिए आरोपी को सीधे गिरफ्तार किया जा सकता था, चाहे प्रक्रिया का पालन हो या न हो. हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की इस ढिलाई और कानून की अनदेखी पर गहरी नाराजगी जताई. निचली अदालत के रिमांड ऑर्डर पर भी सवाल उठाये गए.
याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, खगड़िया ने बिना पुलिस की कमियों को देखे और संवैधानिक प्रक्रिया के उल्लंघन को नजरअंदाज करते हुए 06 जून, 2026 को आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार से 58 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा मांगने के साथ-साथ दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से इसकी कटौती करने और विभागीय जांच की मांग की है.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आलोक में, पटना हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर 2026 को तय की है. कोर्ट ने राज्य सरकार (गृह विभाग, डीजीपी) और शिकायतकर्ता को 26 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है.
राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों की इस नाकामी से एक बार फिर यह साबित होता है कि जमीनी स्तर पर पुलिस प्रक्रियात्मक नियमों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की किस कदर अनदेखी कर रही है. इस मामले पर अगली सुनवाई 30 अक्टूबर ,2026 को होगी.
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-
