लखीसराय के पूर्व ग्रामीण आवास सहायक मिथुन कुमार की अपील खारिज,हाईकोर्ट ने डीडीसी के कार्रवाई करने के अधिकार को माना वैध
पटना: सरकारी आवास योजना में कथित वित्तीय अनियमितता और लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक बयानबाजी के मामले में पटना हाईकोर्ट ने लखीसराय के पूर्व ग्रामीण आवास सहायक मिथुन कुमार को राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने उनकी लेटर पेटेंट अपील खारिज करते हुए सेवा से बर्खास्तगी के फैसले को बरकरार रखा।
अदालत ने माना कि संबंधित परिस्थितियों में उप विकास आयुक्त (डीडीसी) द्वारा की गई कार्रवाई अधिकार क्षेत्र के भीतर थी। मिथुन कुमार ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए दलील दी थी कि उन्हें सेवा से हटाने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट को था, न कि उप विकास आयुक्त को।
दो लाभार्थियों के नाम पर एक ही शौचालय की तस्वीर अपलोड करने का आरोप
यह मामला वर्ष 2019 का है। उस समय मिथुन कुमार लखीसराय जिले के चानन प्रखंड में ग्रामीण आवास सहायक के पद पर कार्यरत थे। उन पर इंदिरा गांधी आवास योजना, जिसे अब प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम से जाना जाता है, के क्रियान्वयन में अनियमितता के आरोप लगे थे।
मामले की जांच के दौरान सामने आया कि दो अलग-अलग लाभार्थियों के नाम पर एक ही शौचालय की तस्वीर सिस्टम में अपलोड की गई थी। इस मामले को विभाग ने गंभीरता से लिया और संबंधित कर्मचारी से जवाब मांगा।
लोकसभा चुनाव में राजनीतिक बयानबाजी का भी मामला
विभागीय कार्रवाई के दौरान एक अन्य मामला भी सामने आया। चानन के तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी को कथित तौर पर एक वीडियो मिला, जिसमें मिथुन कुमार वर्ष 2019 के बेगूसराय लोकसभा चुनाव के दौरान एक प्रत्याशी के पक्ष में राजनीतिक बयान देते दिखाई दिए।
इसके अलावा, 25 अप्रैल 2019 को उनके बिना पूर्व सूचना के कर्तव्य स्थल से अनुपस्थित रहने का मामला भी सामने आया। विभाग ने इन मामलों को लेकर 18 अप्रैल और 20 मई 2019 को कारण बताओ नोटिस जारी किए।
मिथुन कुमार ने अपना पक्ष रखा, लेकिन जिला प्रशासन और उप विकास आयुक्त ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अंततः 6 सितंबर 2019 को ज्ञापन संख्या 1223 के तहत उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।
जिलाधिकारी से लेकर विभागीय सचिव तक नहीं मिली राहत
बर्खास्तगी के बाद मिथुन कुमार ने पहले जिलाधिकारी और फिर ग्रामीण विकास विभाग के सचिव के समक्ष अपील की। हालांकि,उन्हें वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की। एकल पीठ से राहत नहीं मिलने पर उन्होंने लेटर पेटेंट अपील दाखिल की।
अपील के दौरान उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि वर्ष 2014 के विभागीय पत्र के अनुसार, बर्खास्तगी का अधिकार केवल जिलाधिकारी को था। उन्होंने यह भी कहा कि बाद की जांच में वित्तीय अनियमितता का आरोप साबित नहीं हुआ और कार्रवाई का मुख्य आधार चुनाव के दौरान कथित राजनीतिक बयानबाजी थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने नियुक्ति और सेवा समाप्ति से संबंधित विभागीय निर्देशों पर विचार किया। अदालत के समक्ष यह दलील दी गई थी कि बाद में जारी विभागीय निर्देशों के अनुसार, सेवा समाप्त करने का अधिकार डीडीसी के पास नहीं था।
अदालत ने माना कि मिथुन कुमार की नियुक्ति मार्च 2014 में वर्ष 2013 के विभागीय निर्देशों के तहत हुई थी। बाद में जारी निर्देशों से पहले से नियुक्त कर्मचारियों पर लागू सेवा शर्तें और बर्खास्तगी की प्रक्रिया स्वतः समाप्त नहीं हो जातीं। इसी आधार पर अदालत ने संबंधित मामले में डीडीसी की कार्रवाई को वैध माना। खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले में कोई कानूनी या प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं पाई और अपील खारिज कर दी।
संविदा कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण फैसला
इस फैसले से स्पष्ट होता है कि संविदा पर कार्यरत कर्मचारियों को भी अपने दायित्वों और विभागीय नियमों का पालन करना होता है। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन प्रशासनिक जवाबदेही के महत्वपूर्ण पहलू हैं। मिथुन कुमार की अपील खारिज होने के साथ ही उनकी बर्खास्तगी का फैसला बरकरार रहा।
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट

