पटना। बिहार में कोविड-19 के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए फाइलेरिया या हाथीपांव रोग से बचाने के लिए राज्य के 6 जिलों यथा- लखीसराय, नालंदा, समस्तीपुर, रोहतास, नवादा और दरभंगा में आज से से फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम शुरु हो गया। इफाइलेरिया या हाथीपांव रोग स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या है। यह रोग मच्छर के काटने से फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार फाइलेरिया, दुनिया भर में दीर्घकालिक विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है।
किसी भी आयु वर्ग में होने वाला यह संक्रमण लिम्फैटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है और अगर इससे बचाव न किया जाए तो इससे शारीरिक अंगों में असामान्य सूजन होती है। फाइलेरिया के कारण चिरकालिक रोग जैसे हाइड्रोसील (अंडकोष की थैली में सूजन), लिम्फेडेमा (अंगों की सूजन) व काइलुरिया (दूधिया सफेद पेशाब) से ग्रसित लोगों को अक्सर सामाजिक बहिष्कार का बोझ सहना पड़ता है। जिससे उनकी आजीविका व काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। आंकड़ों के अनुसार राज्य में अभी हाथीपांव के लगभग 76 हजार और हाइड्रोसील के लगभग 14 हजार मरीज हैं। 7 जुलाई से शुरू होने वाले कार्यक्रम में लखीसराय, नालंदा, समस्तीपुर, रोहतास और नवादा जिलों में लाभार्थियों को फाइलेरिया से सुरक्षित रखने के लिए 2 दवाएं डीईसी और अल्बंडाजोल एवं दरभंगा में 3 दवाओं डीईसी, अल्बंडाजोलं के साथ आईवरमेंक्टिन की निर्धारित खुराक प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा घर-घर जाकर अपने सामने मुफ्त खिलाई जाएगी। यह दवाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं।
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के अनुसार, कि कालाजार पर राज्य ने बहुत हद तक नियंत्रण कर लिया है। वर्ष 2014 में राज्य में कालाजार के 7615 मरीज थे जो जून 2022 तक घटकर केवल 273 रह गए हैं। उन्होंने बताया कि इस समय राज्य के किसी भी प्रखंड में प्रति 10 हजार की आबादी के सापेक्ष पर 1 से ज्यादा मरीज नहीं हैं। राज्य में प्रमुख रुप से दो जिले सिवान का गोरियागोठी प्रखंड व सारण का इसुआपुर प्रखंड इस बीमरी की चपेट में था। अब यहां भी स्थिति नियंत्रण में आ गयी है। जिसमें केंद्र सरकार की भूमिका अहम है। केंद्र से मिल रहे लगातार सहयोग ने राज्य में कालाजार उन्मूलन की दिशा में अहम योगदान दिया है।

