लखीसराय:मां के दरबार में कोई अपनी खुशियों के लिए प्रार्थना करता है, तो कोई जीवन की मुश्किलों से लड़ने की शक्ति मांगता है. आस्था का यही पवित्र भाव बिहार के लखीसराय जिले के दो प्रमुख धार्मिक स्थलों "बड़ी दुर्गा मंदिर" और "बड़हिया के महारानी स्थान" में देखने को मिलता है. ये दोनों धाम केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि यहां कदम-कदम पर चमत्कार, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं और अटूट विश्वास बसता है. एक ओर बड़ी दुर्गा मंदिर अपने चमत्कारों और सामाजिक सौहार्द की अनूठी मिसाल के लिए जाना जाता है, तो दूसरी ओर महारानी स्थान का सीधा संबंध जम्मू की मां वैष्णो देवी से है. दोनों मंदिरों की अपनी अलग और अद्भुत कहानी है, लेकिन दोनों को जोड़ता है मां के प्रति भक्तों का वह विश्वास, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है.
बड़ी दुर्गा मंदिर, जहां आस्था, चमत्कार और सामाजिक सौहार्द का है अद्भुत संगम
लखीसराय शहर के नया बाजार में स्थित श्री1008बड़ी दुर्गा स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यह स्थान चमत्कारों से भरा है. यहां की मान्यता है कि मेखन लहरी जी के स्वप्न में साक्षात मां दुर्गा आई थीं और उनसे कहा था कि पीपल के पेड़ के नीचे मेरी आराधना करो. तब से लेकर आज तक नवरात्रि में मां की प्रतिमा पूरे विधि-विधान से यहां विराजमान होती है.
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात मां की आरती से जुड़ी है. पिछले47सालों से यहां एक ही प्राचीन तांबे की थाली से मां की आरती उतारी जा रही है. मंदिर के लोगों ने जब कभी थाली बदलने का प्रयास किया, तो मां ने किसी और थाली को स्वीकार ही नहीं किया, जो अपने आप में एक बड़ा चमत्कार माना जाता है. इसके साथ ही पिछले47वर्षों से मंदिर में एक अखंड दीप भी निरंतर जल रहा है. चमत्कारों के अलावा, यह मंदिर सांप्रदायिक सौहार्द की भी जीती-जागती मिसाल है. लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी इस परंपरा में दुर्गा पूजा के दौरान मुस्लिम परिवारों द्वारा शहनाई बजाने की रस्म आज भी निभाई जाती है, जो संस्कृति की एक खूबसूरत तस्वीर पेश करती है.
बड़ी दुर्गा मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य महेंद्र मिश्रा बताते हैं,
"यह बड़ी दुर्गा स्थान बहुत प्राचीन है, लगभग डेढ़-दो सौ साल पुराना यह मंदिर है. इसमें जब भी कोई भक्त आते हैं, कोई मुराद लेकर, कोई कामना लेकर, तो निश्चित रूप से वह पूरा होता है."
स्थानीय निवासी अभिनव का अनुभव
“बड़ी दुर्गा मंदिर हमारे लिए सिर्फ पूजा करने की जगह नहीं है. यहां मां के प्रति लोगों की श्रद्धा के साथ आपसी भाईचारे की परंपरा भी देखने को मिलती है. यही बात इस मंदिर को सबसे खास बनाती है.”
महारानी स्थान, बड़हिया, वैष्णो देवी का साक्षात अंश और सांप का जहर उतारने वाला कुआं
लखीसराय के बड़हिया स्थित महारानी स्थान (मां त्रिपुर बाला सुंदरी) की मान्यता किसी सिद्ध शक्तिपीठ से कम नहीं है. इस मंदिर का सीधा संबंध जम्मू की मां वैष्णो देवी से है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना खुद पंडित श्रीधर ओझा ने की थी, ये वही संन्यासी बाबा थे जिन्होंने सबसे पहले वैष्णो देवी को पहचाना था.
श्रीधर बाबा मूल रूप से बड़हिया के ही निवासी थे. मान्यता है कि एक दिन जब वे गंगा स्नान कर रहे थे, तब मां वैष्णो देवी ने उन्हें अपने ज्वाला रूप में दर्शन दिए और वरदान दिया कि "वो मुझे जहां स्थापित करेंगे, मैं वहीं विराजमान हो जाऊंगी." उस समय बड़हिया घने जंगलों से घिरा हुआ था और वहां सांप-बिच्छुओं का भारी खतरा रहता था. मां के आदेश पर बाबा ने वहां एक कुएं का निर्माण करवाया. यह कुआं आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है और कहा जाता है कि इस कुएं के पवित्र पानी से स्नान करने मात्र से जहरीले सांपों का जहर उतर जाता है और हजारों लोगों की जान बच चुकी है.
स्थानीय निवासी रोहन का अनुभव
“महारानी स्थान की खासियत मां बाला त्रिपुरसुंदरी के प्रति लोगों का अटूट विश्वास है. यहां आकर महसूस होता है कि मंदिर केवल दर्शन की जगह नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, भावनाओं और पुरानी परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है.”
क्यों खास हैं मां के ये दोनों धाम?
एक धाम जहां अपनी 47 साल पुरानी अखंड ज्योति, आरती की थाली और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश करता है, तो दूसरा अपने चमत्कारी कुएं और वैष्णो देवी के साक्षात अंश के रूप में जाना जाता है. लखीसराय के ये दोनों मंदिर यह साबित करते हैं कि आस्था किसी तर्क की मोहताज नहीं होती. यहां सिर्फ पीढ़ियों की विरासत ही नहीं सहेजी जा रही, बल्कि हर साल लाखों लोगों की टूटती हुई उम्मीदों को एक नया सहारा मिल रहा है.
