Patna : पटना हाईकोर्ट ने बिहार में खनन पट्टों की नीलामी और लेटलतीफी के खेल पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है. जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने खनन टेंडरों में पारदर्शिता लाने और सरकारी विभागों की हीलाहवाली खत्म करने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

शेखपुरा जिले के स्टोन ब्लॉक नंबर 27 की नीलामी वर्ष 2017 में हुई थी,जिसमें मेसर्स बालाजी एंटरप्राइज सबसे बड़ी बोलीदाता बनकर उभरा. लेकिन,जिला प्रशासन और खान विभाग द्वारा जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट में सही'जियो-कोऑर्डिनेट्स' (अक्षांश और देशांतर / )न दिए जाने के कारण कंपनी को एनवायरनमेंट क्लीयरेंस मिलने में देरी हो गई.

इसके बावजूद,शेखपुरा के डीएम ने देरी का ठीकरा ठेकेदार पर फोड़ते हुए लेटर ऑफ इंटेंट रद्द कर दिया और ज़मानत राशि के ₹2.90 करोड़ जब्त कर लिए.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि इस देरी के लिए केवल ठेकेदार नहीं,बल्कि सरकारी तंत्र भी बराबर का जिम्मेवार है.

कोर्ट ने सरकार द्वारा जब्त किए गए ₹2.90 करोड़ वापस करने का आदेश दिया और साथ ही इस राशि पर 12% सालाना ब्याज भी देने का निर्देश दिया. सरकार को इस ब्लॉक के लिए नया टेंडर निकालने से पहले यह राशि चुकानी होगी और पीड़ित ठेकेदार को नए टेंडर में भाग लेने से नहीं रोका जा सकता.

हाईकोर्ट की 7'गोल्डन गाइडलान्स'

खनन टेंडरों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार और मुख्य सचिव को कड़े नियम लागू करने का आदेश दिया है.

खनन ब्लॉक के टेंडर नोटिस जारी करते ही जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (डीएसआर) सार्वजनिक करनी होगी. डीएसआर में हर ब्लॉक के सटीक जियो-कोऑर्डिनेट्स दर्ज होने अनिवार्य हैं. नीलामी के 15 दिनों के भीतर'Letter of Intent'जारी करना होगा.

माइनिंग प्लान एलओएल मिलने के 15 दिनों के भीतर सफल बोलीदाता को माइनिंग प्लान देना होगा.

माइनिंग प्लान जमा होने के अगले 15 दिनों के भीतर विभाग को इसे मंजूरी देनी होगी. मंजूरी के 7 दिनों के भीतरSEIAAमें आवेदन करना होगा. यदि सरकारी विभाग दस्तावेज मुहैया कराने में देरी करते हैं,तो इसे सरकार की नाकामी माना जाएगा और सरकार को हर्जाना भरना पड़ेगा. हाईकोर्ट के इस फैसले से जहां एक तरफ लालफीताशाही पर लगाम लगेगी,वहीं दूसरी तरफ पारदर्शी प्रक्रिया से राज्य के राजस्व को भी नुकसान से बचाया जा सकेगा.

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-