गढ़वा: झारखंड के गढ़वा जिले में मां दुर्गा की विदाई की एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक मां गढ़देवी मंदिर में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार श्रद्धालुओं के कंधों पर उठाकर किया जाता है। दशहरा के अवसर पर होने वाले इस विशेष आयोजन में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दौरान पूरा शहर मां दुर्गा के जयकारों से गूंज उठता है।

नौ दिनों तक मां दुर्गा की विधिवत पूजा-अर्चना और आराधना के बाद दशमी के दिन मां गढ़देवी मंदिर में स्थापित दुर्गा दरबार की प्रतिमा को पारंपरिक तरीके से विदाई दी गई। मां की प्रतिमा को अपने कंधों पर उठाने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। महिला और पुरुष श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और भक्तों ने नम आंखों से मां दुर्गा को अंतिम विदाई दी।

भक्तों के कंधों पर निकलती है मां की विदाई यात्रा

मां गढ़देवी मंदिर की विसर्जन परंपरा अन्य स्थानों से इसे अलग पहचान देती है। यहां प्रतिमा को वाहन पर ले जाने के बजाय श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन स्थल तक ले जाते हैं। मां के प्रति श्रद्धा और समर्पण का यह दृश्य लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। स्थानीय स्तर पर इस विसर्जन में लगभग50हजार शहरवासियों के शामिल होने की बात कही जाती है।

रामबांध तालाब में हुआ विसर्जन

मां दुर्गा की प्रतिमा को श्रद्धालु सोनपुरवा स्थित रामबांध तालाब तक लेकर पहुंचे,जहां विधि-विधान के साथ विसर्जन किया गया। नौ दिनों की पूजा-अर्चना के बाद मां को विदाई देते समय श्रद्धालु भावुक नजर आए। भक्तों ने मां दुर्गा से परिवार,समाज और पूरे जिले की सुख-समृद्धि,शांति एवं खुशहाली की कामना की।

गढ़वा जिले में दशहरा का पर्व धार्मिक आस्था,उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। मां गढ़देवी मंदिर की प्रतिमा के विसर्जन के साथ ही जिले के विभिन्न पूजा पंडालों में स्थापित प्रतिमाओं का भी विसर्जन किया गया। इसी के साथ दुर्गापूजा उत्सव का पारंपरिक रूप से समापन हुआ।

मां गढ़देवी की प्रतिमा को भक्तों के कंधों पर उठाकर विसर्जित करने की यह परंपरा गढ़वा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मां की विदाई के इस अनोखे दृश्य में आस्था, भक्ति और वर्षों पुरानी परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

गढ़वा से धर्मेंद्र कुमार की रिपोर्ट