देवघर: देशभर में विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है,लेकिन झारखंड के देवघर में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इसके पीछे बाबा बैद्यनाथ धाम और रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यता बताई जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार,रावण को यहां केवल लंकापति के रूप में नहीं,बल्कि भगवान शिव के परम भक्त और महान विद्वान के रूप में भी देखा जाता है।
रावण से जुड़ी है बाबा बैद्यनाथ धाम की मान्यता
बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार,देवघर की धार्मिक पहचान रावण से जुड़ी मान्यताओं से भी प्रभावित है। मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी और उनकी भक्ति से जुड़ी कथा के कारण बैद्यनाथ धाम का विशेष धार्मिक महत्व है।
स्थानीय धार्मिक परंपरा में रावण को भगवान शिव का अनन्य भक्त और महान ज्ञानी माना जाता है। यही वजह है कि देवघर में रावण के प्रति सम्मान का भाव देखने को मिलता है।
बाबा मंदिर के झूमर में भी रावण का उल्लेख
तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक,बाबा बैद्यनाथ मंदिर से जुड़ी झूमर परंपरा में भी रावण का बखान किया गया है और उसके योगदान के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। स्थानीय मान्यता में रावण की शिवभक्ति को विशेष स्थान प्राप्त है।
देवघर की पहचान बाबा बैद्यनाथ धाम और यहां विराजमान ज्योतिर्लिंग से जुड़ी है। देश-विदेश से श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी शहर की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा मानी जाती हैं।
इसलिए देवघर में नहीं होती रावण दहन की परंपरा
स्थानीय मान्यता के अनुसार,जब रावण को भगवान शिव का परम भक्त और बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण पात्र माना जाता है,तो उसके पुतले का दहन करना उचित नहीं समझा जाता। इसी कारण देवघर में विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती।
जहां देश के कई हिस्सों में रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में किया जाता है,वहीं देवघर में बाबा बैद्यनाथ धाम की परंपरा और रावण की शिवभक्ति से जुड़ी मान्यताओं को विशेष महत्व दिया जाता है।
आस्था और परंपरा से जुड़ी है देवघर की अलग पहचान
देवघर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बाबा बैद्यनाथ धाम के कारण विश्वभर में है। यहां रावण दहन नहीं होने की परंपरा स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और शिवभक्ति से जुड़े विश्वासों को दर्शाती है। यही वजह है कि विजयादशमी के अवसर पर देवघर की परंपरा अन्य शहरों से अलग नजर आती है।
देवघर से अमर पाठक की रिपोर्ट

