Patna : पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट कहा है कि विवाहित महिला अभ्यर्थी का जाति प्रमाण पत्र सिर्फ इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता ,क्योंकि जाति प्रमाणपत्र में पिता के नाम के जगह पति का नाम लिखा हुआ हो. जाति जन्म से मिलती है, प्रमाणपत्र तो सिर्फ उसकी पुष्टि करता है.
जस्टिस मोहित कुमार शाह और जस्टिस सौरेंद्र पांडेय की खंडपीठ ने बिहार लोक सेवा आयोग की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया. ये मामला डॉ. सुषमा शरण से संबंधित है. आवेदिका बीपीएससी के विज्ञापन संख्या 20/2017 के तहत स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद के लिए अनुसूचित जाति महिला कोटे से आवेदन किया था.
कुल 74 पदों में 13 पद अनुसूचित जाति के लिये सुरक्षित था. जिनमें 5 पद महिलाओं के लिए थे. 28 फरवरी, 2018 को साक्षात्कार हुआ और 8 अगस्त, 2019 को रिजल्ट जारी किया गया. प्रकाशित रिजल्ट में उनका नाम नहीं था.
बीपीएससी का कहना था कि जो जाति प्रमाण पत्र दिया गया था, उसमें पिता की जगह पति का नाम था. आयोग ने 2018 में नोटिस जारी कर सही प्रमाण पत्र जमा करने का मौका दिया था. लेकिन पिता के नाम का जाति प्रमाणपत्र नहीं दिया गया, जिस कारण उनकी उम्मीदवारी को अनारक्षित श्रेणी में डाल दिया गया.
महिला उमीदवार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि विज्ञापन में यह शर्त नहीं थी कि प्रमाण पत्र में पिता का ही नाम होना चाहिए. उनके पिता और पति दोनों अनुसूचित जाति के हैं. हाई कोर्ट के एकलपीठ का आदेश जारी विज्ञापन के आधार पर है.
खंडपीठ ने कहा कि विज्ञापन में पिता के नाम की कोई शर्त ही नहीं थी. अनुमंडल पदाधिकारी अंचल अधिकारी से ऊंचे पद के हैं. सिर्फ तकनीकी कारण से किसी को आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराते हुए बीपीएससी को महिला डॉक्टर की नियुक्ति आरक्षण के आधार पर करने का निर्देश दिया.
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-
