पटना: पटना हाईकोर्ट ने अदालत को गुमराह कर जमानत हासिल करने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए आरोपी अमित कुमार की जमानत रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकल पीठ ने आरोपी को तीन सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के आदेश को गलत तरीके से पेश कर निचली अदालत से जमानत हासिल करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ गंभीर धोखाधड़ी है।
यह मामला बोधगया थाना कांड संख्या105/2022 से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आरोपी की जमानत और जमानत बंधपत्र रद्द करते हुए निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करने की स्थिति में गया के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को आरोपी की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
दहेज प्रताड़ना और युवती की मौत से जुड़ा मामला
मामले के विवरण के अनुसार, वर्ष2018 में बोधगया के बतासपुर निवासी सुरेश कुमार की शादी नेहा सिंहा से हुई थी। आरोप है कि शादी के बाद ससुराल पक्ष की ओर से दहेज को लेकर प्रताड़ित किया जाता था।
बताया गया कि22 फरवरी2022 को रिंकी कुमारी का शव फंदे से लटका हुआ मिला था। मामले की जांच के दौरान कॉल डिटेल रिकॉर्ड और केस डायरी में आरोपी अमित कुमार के साथ मृतका की लगातार बातचीत और चैट का विवरण सामने आया। आरोप था कि अमित कुमार उसे डराता-धमकाता था, जिससे परेशान होकर उसने आत्मघाती कदम उठाया। मामले से जुड़े आरोपों और परिस्थितियों पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत विचार किया जा रहा है।
हाईकोर्ट से जमानत याचिका खारिज होने के बाद निचली अदालत से मिली राहत
मामले में3 अक्टूबर2024 को पटना हाईकोर्ट की एक पीठ ने अमित कुमार की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके करीब तीन महीने बाद आरोपी ने गया के अपर सत्र न्यायाधीश-XIX की अदालत में यह दावा किया कि हाईकोर्ट ने संज्ञान और सुपुर्दगी की प्रक्रिया के बाद निचली अदालत को जमानत देने की छूट दी थी।
बताया गया कि निचली अदालत ने हाईकोर्ट के मूल आदेश की सत्यता की जांच किए बिना आरोपी को जमानत दे दी। बाद में मामला हाईकोर्ट के समक्ष आया, जहां आदेश और जमानत दिए जाने की परिस्थितियों की समीक्षा की गई।
हाईकोर्ट ने कहा- न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह कर हासिल आदेश मान्य नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकल पीठ ने पाया कि हाईकोर्ट के मूल आदेश में निचली अदालत को जमानत देने की ऐसी कोई छूट नहीं दी गई थी, जैसा कि आरोपी की ओर से दावा किया गया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि गलत तथ्यों को प्रस्तुत करके या न्यायालय को गुमराह कर प्राप्त किया गया आदेश कानून की नजर में टिकाऊ नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब जमानत पहले ही खारिज की जा चुकी थी और परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ था, तब उन्हीं तथ्यों के आधार पर निचली अदालत द्वारा जमानत दिया जाना न्यायिक अनुशासन के विपरीत है।
तीन सप्ताह में सरेंडर नहीं किया तो होगी गिरफ्तारी
हाईकोर्ट ने अमित कुमार की जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द करते हुए उसे तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी निर्धारित अवधि के भीतर सरेंडर नहीं करता है, तो गया के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक उसे गिरफ्तार करने की कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई में तेजी लाते हुए मुकदमे का शीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया गया है।
इस आदेश के जरिए हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक आदेशों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर राहत हासिल करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी और अदालत की प्रक्रिया की निष्पक्षता तथा न्यायिक अनुशासन बनाए रखना सर्वोपरि है।
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट

