पटना:हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सेवानिवृत्त आईएएस एवं बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमेश कुमार वर्मा को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने उनके खिलाफ8साल पहले की गई उस विभागीय कार्रवाई और दंड को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसके तहत उनकी पेंशन में75%की कटौती कर दी गई थी.

जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ ने निर्णय सुनाते हुए सामान्य प्रशासन विभाग और ग्रामीण विकास विभाग की प्रक्रियात्मक कमियों, आरोपों के अनाधिकृत विस्तार और वैधानिक नियमों की अनदेखी पर सख्त रुख अपनाया.

याचिकाकर्ता1979में उप समाहर्ता (डिप्टी कलेक्टर) के रूप में सेवा में आए थे और31दिसंबर, 2014को सैनिक कल्याण निदेशालय के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए. इससे पूर्व, वे दिसंबर2006से अक्टूबर2009के बीच अररिया में उप विकास आयुक्त (DDC)-सह-मुख्य कार्यपालक अधिकारी (DRDA) के पद पर तैनात थे.

अररिया पदस्थापना के वर्षों बाद, चार विधानसभा क्षेत्रों में एमपी और विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत हाई मास्ट लाइट लगाने के नाम पर वित्तीय अनियमितताओं और अग्रिम भुगतान के आरोप लगाए गए थे. हालांकि विभागीय संकल्प पर29दिसंबर,2014 (सेवानिवृत्ति से दो दिन पूर्व) हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन सेवा में रहते हुए याचिकाकर्ता को आरोप-पत्र (चार्ज-मेमो) कभी हस्तगत नहीं कराया गया.

आरोप-पत्र9जनवरी,2015को स्पीड पोस्ट से भेजा गया, जो उनकी सेवानिवृत्ति के10दिन बाद10जनवरी,2015को उन्हें प्राप्त हुआ.

सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ बिहार बनाम मोहम्मद इदरीस अंसारी मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय कार्रवाई तभी शुरू मानी जाती है,जब आरोप-पत्र आरोपी को वास्तविक रूप से प्राप्त हो जाए. चूंकि आरोप-पत्र सेवानिवृत्ति के बाद मिला, इसलिए यह मामला'बिहार पेंशन नियमावली' के नियम43(b) के दायरे में आता है.

यह नियम4साल से अधिक पुरानी घटनाओं पर कार्रवाई पर रोक लगाता है.2006-2009के मामलों पर सेवानिवृत्ति के बाद कार्रवाई शुरू होने के कारण यह पूरी प्रक्रिया शुरू से ही शून्य थी.

बिहार सीसीए नियम, 2005के नियम17(3) के तहत बिना किसी औपचारिक कार्यकारी संकल्प के आरोपों की संख्या4से बढ़ाकर6कर दी गई. यहां तक कि जांच अधिकारी ने भी छठे आरोप को अप्रमाणित पाया था.

जांच प्रक्रिया समाप्त होने के बाद, जिलाधिकारी द्वारा26दिसंबर2015को सौंपी गई एकतरफा निरीक्षण रिपोर्ट पर अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने भरोसा किया. याचिकाकर्ता को न तो इस रिपोर्ट की प्रति दी गई और न ही इसका खंडन करने या संबंधित अधिकारी से जिरह करने का अवसर दिया गया.

याचिकाकर्ता द्वारा18दस्तावेजी प्रमाणों के साथ प्रस्तुत बचाव पक्ष के बयानों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया. इन दस्तावेजों से साबित था कि आवंटित राशि₹1,58,11,200में से₹1,39,72,000के कार्य सुचारू रूप से पूरे कराए जा चुके थे. कोर्ट ने इसे यांत्रिक आदेश करार दिया. राज्य सरकार द्वारा दोबारा जांच कराने की मांग को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद प्रशासनिक ढिलाई या लापरवाही को छिपाने के लिए दोबारा जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती. विभागीय चूक के कारण एक सेवानिवृत्त अधिकारी को एक दशक से भी अधिक समय बाद फिर से जांच प्रक्रिया में घसीटना पूरी तरह से अमानवीय, अन्यायपूर्ण और प्रशासनिक लापरवाही को बढ़ावा देने जैसा होगा.

कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़े निर्देश देते हुए याचिकाकर्ता के100%पेंशन तुरंत बहाल करने तथा रोकी गई राशि, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का पूरा बकाया6%वार्षिक ब्याज के साथ8सप्ताह के भीतर भुगतान किये जाने का आदेश दिया.

कोर्ट ने जवाबदेही तय करने हेतु आंतरिक जांच किये जाने का निर्देश दिया. इस तरह की अत्यधिक देरी, प्रक्रियात्मक त्रुटियों और वैधानिक उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उन पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने के लिए सरकार आंतरिक जांच शुरू की जाए.

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-