झारखंड के स्वास्थ्य विभाग से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। विभाग ने एक विज्ञापन जारी कर 631 ऐसे डॉक्टरों की सूची सार्वजनिक की है, जो कथित तौर पर लंबे समय से अनुपस्थित हैं या जिन्होंने अपनी नियुक्ति के बाद योगदान ही नहीं दिया। लेकिन, असली पेंच तब फंसा जब इस लिस्ट की पड़ताल हुई। पता यह चला कि इस सूची में कई ऐसे डॉक्टरों के नाम भी शामिल हैं, जो कागजों पर तो 'गायब' हैं, लेकिन हकीकत में रोजाना अस्पतालों में मरीजों का इलाज कर रहे हैं!फिलहाल मामला रांची जिले के बुंडू अनुमंडलीय अस्पताल में पदस्थापित डॉ. शोभा टोप्पो का है। साल 2009 में नियुक्त हुईं डॉ. शोभा टोप्पो लगातार अपनी सेवाएं दे रही हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की इस नई सूची में उनका नाम भी गायब रहने वाले डॉक्टरों की लिस्ट में डाल दिया गया। अब आलम यह है कि मरीजों का इलाज करने वाली डॉक्टर साहिबा खुद विभाग के दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

सवाल यह उठता है कि जो डॉक्टर मरीजों के बीच मौजूद है, उसे सरकारी कागजों में ढूंढने की नौबत आखिर क्यों आ गई?

विभाग ने कुल 631 डॉक्टरों की सूची जारी की है जिसमें अलग-अलग वर्षों के आंकड़े दर्ज हैं:

  • साल 1988 के 1 डॉक्टर

  • साल 1990 के 16

  • साल 2009 के सबसे ज्यादा 308 डॉक्टर

  • साल 2012 के 65

  • साल 2015 के 124

  • और साल 2023 तक के कुल 631 डॉक्टरों के नाम शामिल हैं

यानी करीब 17 साल पुरानी फाइलें अब खंगाली जा रही हैं, जिन पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। हालांकि, सूची में वर्तमान में सक्रिय और ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों के नाम आने से विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।विभाग का इसपर कहना है कि इस पूरी कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की वास्तविक उपलब्धता सुनिश्चित करना है, ताकि रिक्त पदों पर नए डॉक्टरों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो सके। इससे पहले साल 2025 में भी जेपीएससी के माध्यम से नियुक्त 143 ऐसे डॉक्टरों की सेवाएं समाप्त की गई थीं जिन्होंने योगदान नहीं दिया था।

फिलहाल, महकमे की तरफ से यह जरूर कहा गया है कि सूचियों में जो भी त्रुटियां या गलतियां सामने आ रही हैं, उन्हें दुरुस्त किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस प्रशासनिक चूक की जिम्मेदारी कौन लेगा, जिसके कारण अस्पताल में जान बचाने वाले डॉक्टरों को अपनी मौजूदगी का सबूत देने के लिए दफ्तरों की दौड़ लगानी पड़ रही है?