आस्था, शक्ति और राजसी परंपरा का अद्भुत संगम बाघमारा स्थित डुमरा नावागढ़ राजबाड़ी में दुर्गापूजा की परंपरा करीब साढ़े तीन सौ वर्षों से निभाई जा रही है। वक्त बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन मां दुर्गा की आराधना की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। राजपरिवार की पांचवीं पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। यहां पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राजघराने की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। तांत्रिक विधि-विधान से मां की पूजा, परंपरा के अनुसार बलि और राजसी शस्त्रों की विशेष आराधना इस दुर्गोत्सव को खास बनाती है। विजयादशमी पर मां की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाने की परंपरा भी आज तक निभाई जाती है। धनबाद के बाघमारा स्थित डुमरा नावागढ़ राजबाड़ी... जहां दुर्गोत्सव के दौरान इतिहास, परंपरा और भक्ति का अनूठा नजारा देखने को मिलता है। करीब 350 वर्षों से अधिक समय से यहां मां दुर्गा की पूजा पारंपरिक विधि-विधान से की जा रही है। राजा प्रतापनारायण सिंह और राजा बनवारी लाल सिंह के समय से जुड़ी इस परंपरा को राजपरिवार आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहा है।
खास बात यह है कि राजपरिवार की पांचवीं पीढ़ी भी इस विरासत को संजोने में जुटी है। आधुनिकता के इस दौर में भी यहां पूजा की पारंपरिक पहचान और राजसी रीति-रिवाज बरकरार हैं।डुमरा नावागढ़ राजबाड़ी की दुर्गापूजा अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं के लिए जानी जाती है। यहां महालया से ही विशेष अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो जाता है। नवरात्र के दौरान षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी को पारंपरिक तांत्रिक विधि-विधान से मां की आराधना की जाती है।इस पूजा की एक और विशेष पहचान है परंपरागत पशु बलि। राजपरिवार की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा के अनुसार अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। यही विशिष्टता इस राजबाड़ी की दुर्गापूजा को कोयलांचल के अन्य पूजा आयोजनों से अलग पहचान देती है।राजपरिवार की इस ऐतिहासिक पूजा में शक्ति उपासना का विशेष महत्व है। यहां मां दुर्गा की आराधना के साथ राजसी शस्त्रों की भी विशेष पूजा की जाती है। महाअष्टमी और नवमी के अवसर पर होने वाला यह अनुष्ठान राजघराने की परंपरा और शौर्य की विरासत को दर्शाता है।राजपरिवार के सदस्य आज भी इन परंपराओं को पूरी आस्था के साथ निभाते हैं। पूजा का आयोजन और उसका खर्च भी राजपरिवार की ओर से वहन किए जाने की परंपरा रही है।
डुमरा नावागढ़ राजबाड़ी की दुर्गापूजा सिर्फ राजसी ठाठ-बाट तक सीमित नहीं है। यहां सेवा, विनम्रता और सामाजिक समरसता की परंपरा भी देखने को मिलती है। मान्यता और परंपरा के अनुसार, राजपरिवार के सदस्य मां के दरबार में स्वयं झाड़ू लगाकर सेवा करते हैं।वहीं, विजयादशमी के अवसर पर स्थानीय आदिवासी समुदाय का पारंपरिक बिसहरी नृत्य इस आयोजन को सांस्कृतिक रंग प्रदान करता है। यह परंपरा क्षेत्र की लोकसंस्कृति और सामाजिक सहभागिता की झलक पेश करती है।इस ऐतिहासिक दुर्गोत्सव का एक और खास दृश्य विजयादशमी के दिन देखने को मिलता है। जहां आज अधिकांश जगहों पर प्रतिमाओं को वाहनों के जरिए विसर्जन के लिए ले जाया जाता है, वहीं डुमरा नावागढ़ राजबाड़ी में मां दुर्गा की प्रतिमा को श्रद्धालु और स्थानीय लोग अपने कंधों पर उठाकर राजा तालाब तक ले जाते हैं।
सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों की आस्था का केंद्र है। मां की विदाई का यह पारंपरिक तरीका राजबाड़ी की ऐतिहासिक पहचान को जीवंत बनाए रखता है।
