Patna: पटना हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान निचली अदालत के एक निर्णय पर गहरी नाराजगी जताई है. पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट),पटना की अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के फैसले को पूरी तरह रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के कामकाज और कानूनी ज्ञान पर बेहद सख्त टिप्पणी की है.

ये मामला वर्ष 2010 में संपन्न हुए एक ईसाई जोड़े के विवाह और 2014 में दायर तलाक की याचिका से जुड़ा है. निचली अदालत ने इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट,1872 की धारा 10(1) के तहत तलाक की याचिका को खारिज कर दिया था. इस निर्णय के विरुद्ध महिला ने पटना हाईकोर्ट में मिसलेनियस अपील दायर की.

इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट की न्यायाधीश ने जिस कानून इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट का हवाला देकर तलाक की याचिका रद्द की,वह भारत में ईसाई जोड़ों के तलाक के मामलों पर लागू ही नहीं होता. भारत में ईसाई समुदाय के तलाक और वैवाहिक विवादों का निस्तारण'डाइवोर्स एक्ट,1869'के तहत किया जाता है.

कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ कानून की अनभिज्ञता नहीं,बल्कि न्यायाधीश की गंभीर लापरवाही है. कोर्ट ने हैरानी जताते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि फैसला सुनाने से पहले संबंधित कानून की जांच तक नहीं की गई. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत की इस कार्यप्रणाली और अज्ञानता पर सख्त ऐतराज जताते हुए अत्यंत गंभीर और कड़ी टिप्पणी दर्ज की.

यह नोट करना दुर्भाग्यपूर्ण है कि पटना स्थिति फैमिली कोर्ट की अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के पद पर तैनात एक न्यायिक अधिकारी ने मुकदमे का फैसला करने के लिए लागू होने वाले कानून का सत्यापन किए बिना ही एक वाद में आदेश पारित कर दिया. यह न केवल अज्ञानता है,बल्कि संबंधित ट्रायल जज की ओर से सरासर लापरवाही है. यदि ऐसा होता है,तो हमें बिहार राज्य में न्यायपालिका के भविष्य को लेकर डर लगता है.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि महिला वर्ष 2010 से ही अपने पति से अलग रह रही है. भले ही महिला व्यभिचार का आरोप साबित न कर सकी हो,लेकिन दो वर्ष से अधिक समय तक लगातार अलग रहने के आधार पर वह तलाक पाने की हकदार है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के खारिज करने वाले फैसले को रद्द कर दिया और दंपत्ति के विवाह को औपचारिक रूप से विघटित कर दिया.

तलाक की मंजूरी के साथ ही स्थायी भरण-पोषण के निर्धारण के लिए हाईकोर्ट ने पति की वास्तविक संपत्तियों की जांच का जिम्मा एक विशेष अधिकारी को सौंपा. विशेष अधिकारी की गोपनीय जांच रिपोर्ट से बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. पति,जो खुद को एक मामूली आय वाला व्यक्ति और परोपकारी बता रहा था,वास्तव में करोड़ों की संपत्ति का मालिक निकला.

इस जांच में पाया गया कि पाटलिपुत्र कॉलोनी जैसी पॉश लोकेशन में उसका 9,322 वर्ग फीट का भूखंड और मकान स्थित है. इसके अतिरिक्त,उसने पटना के मौजा-मैनपुरा में स्थित अपनी 8.36 डिसमिल जमीन (जिसकी कीमत बैंक मूल्यांकन में ₹4 करोड़ दर्ज है) और ₹1.5 करोड़ की एफडी को'बैंक' के पास बंधक रखकर एक कंस्ट्रक्शन कंपनी के लिए ₹9.80 करोड़ का कमर्शियल लोन दिलवाया था.

पति के इस व्यापक वित्तीय साम्राज्य और करोड़ों की अचल संपत्तियों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने उसे एक संपन्न व्यक्ति करार दिया. पति के वास्तविक वित्तीय स्थिति पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा रेस्पोंडेंट (पति) 4 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति का मालिक है. इसलिए,रेस्पोंडेंट एक संपन्न व्यक्ति है.

महिला के मासिक खर्च (₹40,450) और पति के असली वित्तीय रसूख को देखते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि पति अपनी पूर्व पत्नी को ₹50,00,000 (पचास लाख रुपये) की एकमुश्त स्थायी भरण-पोषण राशि 3 महीने के भीतर भुगतान करे. इस राशि के भुगतान के साथ ही दोनों पक्षों के बीच लंबित अन्य वैवाहिक मामले भी समाप्त माने जाएंगे.

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-