पटना : 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के हाथों हुई अपनी पराजय से दुखी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब अपनी कुर्सी और राजनीतिक नैया जीतन राम मांझी को सौपी होगी तो उन्हें कभी यह अहसास नही रहा होगा कि वही मांझी उनकी नाव को डुबाने की कोशिश करेगें जिसकी पतवार उन्होने ही मांझी को सौंपी है.लेकिन हुआ ठीक उसका उल्टा जब जीतनराम मांझी ने एक बार नही बार बार नीतीश की नैया को डुबोने की कोशिश की और नीतीश अपनी डगमगाती नैया को किनारा लगाने में सफल हुए .
दरअसल 2013 में नरेन्द्र मोदी के विरोध के चलते एन डी ए से अलग हुए नीतीश 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी को दो सीट पर सिमटने से नही रोक पाये. अपनी हार से विचलित नीतीश ने अपनी ही पार्टी के दलित नेता जीतन राम मांझी को अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी को इस भरोसे सौप दी कि वे उनकी विरासत को आगे ही नहीं बढायेगें जद यू की राजनीतिक नैया को भी किनारा लगायेगें. लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा . 9 महीना बीतते - बीतते मांझी ने ऐसी हालात पैदा कर दी कि नीतीश को विवश होकर फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना पड़ा . लेकिन यह क्या मांझी ने नीतीश का दामन छोड़ अपनी अलग पार्टी ही बना ली और 2015 के विधान सभा चुनाव में नीतीश के दुश्मन नरेन्द्र मोदी से हाथ मिला लियाऔर 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार को उतारा लेकिन केवल अपनी लाज बचा पाये.
फिर 2017 में मोदी का साथ छोड़ राजद या यू पी ए के खेमें में आये अपने बेटे संतोष कुमार सुमन को विधान परिषद का सदस्य बनाया और साथ ही 2019 में लोकसभा की तीन सीटों पर अपनी पार्टी के उ्मीदवारो को उतारा ये अलग बात है कि खााता भी नही खुला.लेकिन 2020 आते - आते उन्होने फिर नीतीश का दामन पकड़ एन डी ए में अपनी जगह बनायी और 7 विधान सभा सीटों पर चुनाव लड़ा और चार सीटें हासिल की और अपने बेटे संतोष कुमार सुमन को मंत्री बनवाने में कामयाब हुए . उसके बाद 2022 के महागठबंधन के साथ आने पर मांझी भी नीतीश के साथ आ गये. . हालांकि भले ही मांझी के चार उम्मीदवार जीते लेकिन उनका वोट प्रतिशत 2015 में जो 2 प्रतिशत था वह घटकर 0.89 प्रतिशत पर आ गया.
सूबे के राजनीतिक पंडितो की माने तो बिहार के दलित वोट बैंक में जीतनराम मांझी की बिरादरी यानि मुशहरों की संख्या करीब 35 लाख है.जिस पर मांझी अपना हक मानते हैं . शायद यही वजह है कि मांझी हर चुनाव के पहले अपना पाला ही नही बदलते रहे है अपने गठबंधन की नैया भी डगमगाते रहे हैं चाहे वह विधान सभा का चुनाव रहा हो या फिर लोकसभा का चुनाव .
मांझी अपना राजनीतिक प्रयोग इस बार भी दुहराने की फिराक में थे यही वजह थी कि मांझी ने लोकसभा चुनाव के पहले ही पाला बदलने का खेल शुरू कर दिया. एक तरफ जहां नीतीश कुमार पूरे देश में विपक्षी एकता को मुकाम तक पहुंचाने में लगे थे तो जीतनराम मांझी इस अभियान की हवा निकालने की फिराक में . यही वजह रही कि पिछले 13 अपैल को मांझी ने जहां दिल्ली जाकर केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की वही उसके ठीक 60 दिन बाद ही अपने बेटे को नीतीश कैबिनेट से इस्तीफा दिलवाकर नीतीश को एक झटका देने की कोशिश की . मांझी ने नीतीश पर उनकी पार्टी को जद यू में विलय का आरोप लगाया साथ ही 23 जून को पटना में आयोजित विपक्षी नेताओं की बैठक में निमंत्रण नही देने का भी .
इसके पूर्व भी मांझी रात में सी एम नीतीश से मुलाकात तो दिन मे राज्यपाल से मुलााकात करने के अलावे समय - समय पर ऐसा बयानबाजी करते रहे जो नीतीश को असहज करनेवाला था. लेकिन इस बार शायद मांझी ने रांग नंबर डायल कर दिया और नीतीश ने उन्हें अपने गठबंधन से ही बाहर निकाला मांझी पर भेदिया होने का गंभीर आरोप भी लगाया . नीतीश ने सबसे पहले मांझी के बेटे का इस्तीफा ही नही लिया उसकी जगह मुशहर समाज से आने वाले रत्नेश सदा को मंत्री भी बना दिया.
शुक्रवार को मंत्रिमंडल विस्तार समारोह में शामिल होने के बाद नीतीश ने मीडियाकर्मियो के समक्ष मांझी की पोल खोल कर रख दी. नीतीश ने बतलाया कि किस तरह उन्होनें उन पर भरोसा कर मुख्यमंत्री बनाया और उनके बेटे को मंत्री . लेकिन फिर भी मांझी भरोसे मंद नही रहे और बीेजपी नेताओं से संपर्क में थे. इसलिये हमने दो टूक फैसला लिया है और उन्हें गठबंधनसे बाहर किया . ऩीतीश इतना पर ही नही रूके उन्होंने दावा किया कि अगर मांझी को 23 जून की बैठक में मौजूद रहते तो मीटिंग की सारी जानकारी बीजेपी नेताओं को दे देते . यानि भेदिया का काम करते. ऐसे मे भला वो कैसे मांझी को साथ रखते . यानि नीतीश को इस बार बीमारी का पता समय पर चल गया है और उसका इलाज भी कर दिया है. हालांकि जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन ने नीतीश के आरोपों का खंडन किया है . लेकिन इतना तो सच है कि जीतनराम का अगला पड़ाव बीजेपी है जो नीतीश का दुश्मन नंबर वन है.
अशोक मिश्रा. कशिश न्यूज.

