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HC का बड़ा फैसला: ड्यूटी के दौरान किए गए काम पर अधिकारी के खिलाफ सीधे आपराधिक मुकदमा नहीं, संज्ञान आदेश रद्द

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Deepak Kumarलेखक

पटना हाईकोर्ट ने कर्तव्यपरायण सरकारी अधिकारियों को एक बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।कोर्ट ने कहा है कि आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए काम के लिए किसी अधिकारी को बिना सक्षम प्राधिकार की अनुमति के आपराधिक मुकदमे में नहीं घसीटा जा सकता।जस्टिस राणा विक्रम सिंह की एकलपीठ ने हरेन्द्र नाथ दुबे की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया।कोर्ट ने शेरघाटी के एसडीजेएम के संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया।

शिकायतकर्ता दीपक कुमार सिंह ने आरोप लगाया था कि उस के भाई धीरेन्द्र कुमार सिंह कुमार राइस मिल चलाते हैं। 9 दिसम्बर, 2013 को खाद्य निगम के तत्कालीन जिला प्रबंधक हरेन्द्र नाथ दुबे और अन्य अधिकादरियों ने राइस मिल में घुसकर गाली-गलौज, मारपीट की और करीब 20 हजार क्विंटल चावल, जिसकी कीमत करीब 5 करोड़ रुपये थी,उसे उठा कर ले गए।

इस शिकायत पर आईपीसी की विभिन्न धाराओ के तहत संज्ञान लिया गया।कोर्ट को बताया गया कि यह शिकायत बदले की भावना से दायर की गई हैं।दरअसल ,मिल मालिक ने बिहार राज्य खाद्य निगम के साथ 12 अप्रैल,2013 को धान कुटाई का समझौता किया गया था।

7 करोड़ 15 लाख रुपए की बैंक गारंटी पर 60 हजार क्विंटल धान दिया गया। लेकिन चावल वापस नहीं किया गया। जिसको लेकर 22 नवम्बर, 2013 को मिल मालिक के खिलाफ 3 करोड़ 48 लाख गबन किये जाने को लेकर अमस थाना कांड संख्या 155/2013 दर्ज किया गया।

कोर्ट को बताया गया कि आवेदक सक्षम प्राधिकार के निर्देश पर गठित आधिकारिक टीम के सदस्य थे, जिसने मिल का निरीक्षण, इन्वेंट्री, जब्ती और वीडियोग्राफी की थी। इस पर गया के अपर समाहर्ता ने 23 दिसम्बर, 2013 को अपने रिपोर्ट में आरोपों को झूठा और निराधार करार दिया था।

कोर्ट ने शिकायत में आवेदक के खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं पाते हुये कहा कि सभी आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं।कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता के धारा 197 का हवाला देते हुए कहा कि ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाना जाना चाहिए।

कोर्ट ने संज्ञान आदेश की प्रक्रिया पर भी सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि संज्ञान आदेश किसी क्लर्क के लिखे प्रोफार्मा पर खाली जगह में सिर्फ 'संज्ञान' शब्द भरकर नहीं लिया जा सकता। संज्ञान लेते समय न्यायिक विवेकपूर्ण का प्रयोग दिखाना चाहिए।कोर्ट ने संज्ञान आदेश और उसके बाद की पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट

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