पटना : 1974 में कांग्रेसी हुकुमत के खिलाफ छात्र नेता के रूप मेें पहली बार मध्यप्रदेश के जबलपुर से लोक सभा का उप चुनाव जीतकर पूरे देश में तहलका मचा देनेवाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद यादव ने कभी कल्पना नही की होगी कि जीवन के अतिम समय में उन्हें राजनीतिक वनवास झेलना पड़ेगा।

लोकसभा का 7 बार और राज्य सभा का 3 बार चुनावी सफर करने वाले शरद यादव की कभी बिहार में तूती बोलती थी और जेपी आंदोलन के दो बड़े दिग्गज नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार उन्हें अपना राजनीतिक अभिभावक मानते थे। ये अलग बात है कि कभी लालू को मुख्यमंत्री बनाने वाले शरद यादव को लालू प्रसाद से ही टकराहट हुई वह चाहे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का मामला हो या फिर चुनावी मैदान का, दोनों ने एक दूसरे को पछाड़ा भी।

लालू ने जनता दल से अलग पार्टी बना राष्ट्रीय जनता दल के खुद अध्यक्ष बने तो शरद यादव भी जद यू के अध्यक्ष बने। चुनावी मैदान में मधेपुरा में 1999 में शरद ने लालू को हराया तो 2004 में लालू से हारे भी। लेकिन 2017 में नीतीश का बीजेपी के साथ जाने के फैसले के बाद शरद की बगावत ने उन्हें नीतीश से तो अलग कर दिया फिर वे लालू के साथ जुड़े। 2019 के लोकसभा चुनाव मे लालटेन थामा भी लेकिन चुनावी हार ही हुई। इधर राज्य सभा की सदस्यता गयी तो दिल्ली के सरकारी आवास को खाली करने का फरमान भी।

जीवन के अतिम पायदान पर पहुंचे शरद ने 20 मार्च 2022 को अपनी पार्टी का पूरी तरह से राजद में विलय कर लिया। उस समय यह राजनीतिक गलियारो में यह चर्चा जोर से थी कि दिल्ली में सरकारी आवास खाली करने के बाद बेघर हो रहे शरद यादव को नया आशियाना लालू और तेजस्वी राज्यसभा में भेजकर देगे। लेकिन शुक्रवार को राजद के दो प्रत्य़ाशी यानि मीसा भारती और फैयाज अहमद ने नमांकन दाखिल कर दिया लालू और तेजस्वी की मौजूदगी में .मध्यप्रदेश के जबलपुर से इंजीनियरिंग की तालीम लेने वाले और अपने समाज को समाजिक न्याय दिलाने के लिये राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग के भी माहिर रहे शरद लेकिन उन्हें क्या पता कि अब दिल्ली ही नही सामाजिक न्याय भी उनसे दूर हो गया है।

शायद यही वजह है कि देश की राजधानी दिल्ली में एक अदद घर के लिये राजद में पूरी पार्टी का विलय करने वाले शरद यादव मुंह ताकते रह गये और फैयाज अहमद लालटेन लेकर दिल्ली पहुंचने को तैयार बैठे हैं।

अशोक मिश्र, कशिश न्यूज .