बेगूसराय:नवरात्र में जहां भक्ति, शक्ति और साधना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.वो स्थान बेगूसराय के बखरी का प्राचीन पुरानी दुर्गा मंदिर शक्तिपीठ है. यहां मां भगवती नगर की रक्षा करने वाली नगरक्षिका के रूप में पूजी जाती हैं, जहां अष्टभुजी माता की स्वर्ण प्रतिमा के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं.

बखरी के प्राचीन दुर्गा मंदिर में विराजती हैं नगरक्षिका मां भगवती, स्वर्ण प्रतिमा से जुड़ी है सदियों पुरानी मान्यता

ऐसी मान्यता है कि मां भगवती अपने भक्तों की पुकार सुनती हैं और सच्चे मन से की गई आराधना से भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.

बखरी के प्राचीन दुर्गा मंदिर में विराजती हैं नगरक्षिका मां भगवती, स्वर्ण प्रतिमा से जुड़ी है सदियों पुरानी मान्यता

करीब500से600वर्ष पुराने इस मंदिर के प्रति लोगों की अटूट आस्था है. उतरप्रदेशकेवाराणसीएवंबिहार के अलग-अलग जिलों के अलावा पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु यहां मां के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों के लिए मां भगवती केवल आराध्य देवी नहीं, बल्कि नगर की रक्षक और संकटों से उबारने वाली शक्ति हैं.

बखरी के प्राचीन दुर्गा मंदिर में विराजती हैं नगरक्षिका मां भगवती, स्वर्ण प्रतिमा से जुड़ी है सदियों पुरानी मान्यता

स्वर्ण प्रतिमा से जुड़ी है मां की महिमा की अनूठी मान्यता

इस प्राचीन शक्तिपीठ में अष्टभुजी मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा विराजमान है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, परमार वंश के राजाओं को यह प्रतिमा मुंगेर के कष्टहरणी घाट पर स्नान के दौरान प्राप्त हुई थी. कहा जाता है कि इसके बाद परमार वंश के लोगों ने मध्य प्रदेश के थार क्षेत्र से आकर यहां मंदिर की स्थापना कराई. तभी से यह स्थान मां भगवती की आराधना का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. मां के आठ हाथ शक्ति, साहस और दुष्ट शक्तियों पर विजय के प्रतीक माने जाते हैं.

गणेश चतुर्थी से ही शुरू हो जाती है मां के आगमन की तैयारी

बखरी के इस मंदिर में नवरात्र की तैयारियां भी अपनी विशेष परंपरा के साथ शुरू होती हैं. गणेश चतुर्थी से ही दुर्गा प्रतिमा के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है. जैसे-जैसे नवरात्र आगे बढ़ता है, मंदिर परिसर में श्रद्धा और भक्ति का माहौल गहराता जाता है. पहली पूजा से शुरू होने वाली भव्य संध्या आरती यहां के धार्मिक आकर्षण का प्रमुख केंद्र है.

वाराणसी के अस्सी घाट की तर्ज पर होने वाली इस आरती में वैदिक मंगलाचरण, शंखनाद और मां भगवती की स्तुति वातावरण को भक्तिमय बना देती है. स्थानीय दावों के मुताबिक, प्रतिदिन15हजार से अधिक श्रद्धालु इस आरती में शामिल होते हैं. मां की आरती के दौरान गूंजते जयकारे और शंखनाद भक्तों के मन में श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं.

महाअष्टमी की मध्यरात्रि में विशेष आराधना

मंदिर में महाअष्टमी की मध्यरात्रि को विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा है. इसके साथ ही परंपरागत रूप से छागर की बलि दी जाती है, जबकि नवमी के दिन हजारों छागरों की बलि चढ़ाने की प्रथा बताई जाती है. मंदिर की पहचान तंत्र साधना की प्राचीन परंपराओं से भी जुड़ी हुई है. श्रद्धालुओं के लिए ये अनुष्ठान मां भगवती की शक्ति और परंपरागत उपासना पद्धति के प्रतीक हैं.

विजयादशमी पर नीलकंठ की परंपरा, सुख-समृद्धि की कामना

विजयादशमी के दिन परमार वंश के लोग भव्य शोभायात्रा निकालते हैं. इस दौरान नीलकंठ पक्षी को उड़ाने की परंपरा भी निभाई जाती है. धार्मिक मान्यता में नीलकंठ के दर्शन को शुभ माना जाता है. इस परंपरा के माध्यम से लोग मां भगवती से परिवार, समाज और पूरे नगर की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

मां की महिमा से जुड़ी है पीढ़ियों की आस्था

बखरी का पुरानी दुर्गा मंदिर शक्तिपीठ आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं, स्वर्ण प्रतिमा, भव्य संध्या आरती और विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठानों के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. यहां मां भगवती को नगरक्षिका के रूप में पूजने की परंपरा इस मंदिर को विशेष पहचान देती है.

नवरात्र में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़, मां के जयकारे और आरती की दिव्यता इस बात को दर्शाते हैं कि सदियों से चली आ रही आस्था आज भी लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है. भक्तों के विश्वास में मां भगवती शक्ति भी हैं, सुरक्षा भी और उम्मीद की किरण भी.

अंकिता सिंह की रिपोर्ट