11वीं से 13वीं JPSC यानी झारखंड संयुक्त प्रशासनिक सेवा परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ियों के मामले में झारखंड सरकार ने हाईकोर्ट में एक बेहद अहम हलफनामा दाखिल किया है। सरकार ने अदालत को साफ तौर पर बताया है कि इस मामले की जांच में कई ऐसे गंभीर तथ्य सामने आए हैं, जो परीक्षा प्रणाली के दूषित (संदेहास्पद) होने की ओर इशारा करते हैं। सरकार का कड़ा रुख है कि पैसे लेकर बेची गई परीक्षा के आधार पर चयनित लोगों को प्रशासनिक पदों पर नहीं रखा जा सकता।सरकार ने हाईकोर्ट में स्पष्ट किया है कि केवल परीक्षा में सफल हो जाने या नियुक्ति पत्र मिल जाने मात्र से किसी अभ्यर्थी को पद पर हमेशा बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।

  • नियम 16(6) का हवाला: विज्ञापन के नियम 16(6) के अनुसार, यह अधिकार पूर्ण नहीं है।

  • धोखाधड़ी का सिद्धांत: सरकार ने कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि अगर गड़बड़ी या धोखाधड़ी साबित होती है, तो नियुक्तियों को रद्द किया जा सकता है।

  • राज्य हित सर्वोपरि: सरकार का तर्क है कि प्रशासनिक सेवा राज्य की रीढ़ होती है। याचिकाकर्ताओं के निजी हितों की तुलना में, राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की पवित्रता और लाखों ईमानदार युवाओं के अधिकार कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसी आधार पर उन नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला लिया गया है जिनके खिलाफ याचिकाएं दायर की गई थीं।

    इस पूरे मामले की गंभीरता का अंदाजा सीआईडी (CID) की जांच से लगाया जा सकता है:

    • गिरफ्तारियां: अब तक इस मामले में 28 संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

    • नोटिस: परीक्षा में सफल रहे 265 अभ्यर्थियों को पूछताछ के लिए नोटिस भेजे गए हैं।

    • चौंकाने वाला खुलासा: परीक्षा आयोजित करने वाली कंपनी ‘ICN’ के संचालक से जुड़े कई राज खुले हैं। सीआईडी के अनुसार, कुछ अभ्यर्थियों को कोलकाता, बिहार और नेपाल ले जाकर उत्तर रटवाए गए थे। इन 28 में से 10 अभ्यर्थी ऐसे हैं जिनका चयन भी हो गया था। अब इनकी भूमिका की भी गहराई से जांच हो रही है।संक्षेप में कहें तो, झारखंड सरकार और जांच एजेंसियों का रुख बिल्कुल साफ है—भ्रष्टाचार के जरिए हासिल की गई नौकरियों को बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि झारखंड हाईकोर्ट इस मामले में आगे क्या कड़े कदम उठाता है।