किसी ने सिलाई मशीन से शुरुआत की, तो किसी ने घर में तैयार होने वाले आटा, सत्तू और मसाले को बाजार तक पहुंचाने का रास्ता चुना। शुरुआत अलग थी, लेकिन दोनों के सफर में एक चीज समान रही, अपने काम को आगे बढ़ाने का हौसला और जीविका समूह का साथ जिसने स्वावलंबन को नई दिशा दी। 2 अक्टूबर 2006 को बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसाइटी (BRLPS) के माध्यम से शुरू हुई इस पहल ने इन दो दशकों में ग्रामीण महिलाओं को समूहों से जोड़ने के साथ उन्हें बचत, ऋण, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसरों से जोड़ा है। इसका असर गांवों में महिलाओं की बदलती भूमिका में भी दिखाई देता है।

अब महिलाएं केवल घर की जरूरतों तक सीमित नहीं हैं। वे अपने छोटे-छोटे कारोबार चला रही हैं, बाजार से जुड़ रही हैं और अपनी आमदनी के जरिए परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं। पटना की कुसुम देवी और नालंदा की सुलेखा कुमारी की कहानी भी इसी बदलाव की तस्वीर पेश करती है।
"पहले खेतों में काम करती थी, आज खुद का डेयरी केंद्र चला रही हूं"

खेतों में काम करने से लेकर अपनी दुकान चलाने तक

पटना की कुसुम देवी के लिए बदलाव की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई, जब वह जीविका समूह से जुड़ीं। इससे पहले उनकी दिनचर्या खेतों में काम करने के बीच गुजरती थी। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें सिलाई सीखने का मौका मिला। प्रशिक्षण पूरा कर जब वह वापस लौटीं, तो उनके पास हुनर था और उसे काम में बदलने का भरोसा भी। समूह के जरिए उन्हें ऋण की जानकारी मिली। उन्होंने 40 हजार रुपये का ऋण लिया और सिलाई मशीन खरीदी। इसी मशीन के सहारे उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया। धीरे-धीरे काम बढ़ा और उससे होने वाली आमदनी घर के खर्च में लगने लगी। बच्चों की पढ़ाई से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक, कुसुम देवी की कमाई परिवार के लिए सहारा बनने लगी। समय के साथ उन्होंने अपने रोजगार को एक और दिशा देने की कोशिश की। उन्हें सुधा केंद्र से जुड़ने की जानकारी मिली। आवेदन करने के बाद लॉटरी के माध्यम से उन्हें सुधा केंद्र मिला। केंद्र के लिए उन्हें फ्रीजर और डीप फ्रीजर सहित जरूरी सामान उपलब्ध कराया गया।

इसके बाद उन्होंने वहां दूध, लस्सी, दही और आइसक्रीम की बिक्री शुरू की। सिलाई के काम से शुरू हुआ उनका सफर अब एक नए कारोबार से भी जुड़ गया है। कुसुम देवी बताती हैं कि सुधा केंद्र से उन्हें रोजाना करीब 1000 से 1500 रुपये तक की आमदनी हो रही है। आज उनके लिए यह काम सिर्फ कमाई का जरिया नहीं है। वर्षों पहले सिलाई मशीन से शुरू की गई मेहनत अब उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास दे रही है।

कुसुम देवी इस अवसर के लिए माननीय मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताती हैं और मानती हैं कि जीविका से मिले सहयोग ने उनके रोजगार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परिवार के साथ मिलकर चल रहा कारोबार

नालंदा की सुलेखा कुमारी ने वर्ष 2024 में जीविका से जुड़ने के बाद अपने घर से ही कारोबार को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना। वह आटा, सत्तू, बेसन और मसाले तैयार करने का काम करती हैं। इस काम में उनका परिवार भी उनके साथ है। सुलेखा कुमारी के पति बाहर से कच्चा माल लेकर आते हैं। इसके बाद घर के सदस्य मिलकर उसे पीसने, तैयार करने और पैक करने का काम करते हैं। फिर तैयार सामान को बाजार तक पहुंचाया जाता है। धीरे-धीरे उनके उत्पादों की पहुंच भी बढ़ी है। सुलेखा कुमारी के यहां तैयार होने वाला सत्तू, बेसन और आटा पटना के अलावा बिहारशरीफ, नगरनौसा और चंडी तक पहुंच रहा है। घर से शुरू हुआ यह काम अब आसपास के बाजारों में अपनी जगह बना रहा है। इस काम से सुलेखा कुमारी को हर महीने करीब 25 हजार रुपये की आमदनी हो रही है।
"पहले खेतों में काम करती थी, आज खुद का डेयरी केंद्र चला रही हूं"

वह बताती हैं कि जीविका समूह से उन्हें आर्थिक मदद मिली और समूह से लिया गया ऋण भी उन्होंने चुका दिया है। परिवार के लोगों के साथ मिलकर काम करने से कारोबार को संभालना आसान हुआ है और घर बैठे रोजगार का रास्ता भी बना है। सुलेखा कुमारी के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि उनका तैयार किया हुआ सामान अब उनके घर की सीमा से बाहर निकलकर अलग-अलग बाजारों तक पहुंच रहा है।इससे उन्हें अपने काम को और बड़ा करने का हौसला मिल रहा है।

कुसुम देवी की सिलाई मशीन हो या सुलेखा कुमारी का घर में तैयार होता सत्तू और मसाला दोनों कहानियां इस बात की मिसाल हैं कि छोटे स्तर पर शुरू किया गया काम भी सह सहयोग और लगातार मेहनत से आगे बढ़ सकता है। जीविका के 20 वर्षों की यात्रा में ऐसी लाखों कहानियां जुड़ी हैं, जहां महिलाओं ने अपनी मेहनत से न सिर्फ परिवार को संभाला, बल्कि अपने लिए एक समाज में नई पहचान भी बनाई है।