पटना : बिहार ही नही देश की राजनीति में कभी अपने समर्थकों तों कभी अपने राजनीतिक विरोधियों को चौंकाने वाले सूबे के वजीरे आला नीतीश कुमार ने जब गत 10 अगस्त को 8 वीं बार कमान संभाली तो उनके राजनीतिक विरोधी तो हक्के बक्के थे ही समर्थक भी भौंचक थे . आखिर हों भी क्यो नही उन्हें क्या पता कि पिछले 17 वर्षो में सरकारें बदलती है लेकिन सरकार के मुखिया नीतीश ही रहते हैं. और सूबे की राजनीति के इस हकीकत को विधान सभा के अंदर 24 अगस्त कों स्वीकार किया कल तक नीतीश के बगल में बैठने वाले राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद ने . आखिर तार किशोर इस सच को स्वीकार ना करे तो क्या करें. 2020 के विधान सभा चुनाव में 43 सदस्यों की हैसियत वाली पार्टी जद यू के मुखिया नीतीश को 75 सदस्यों वाली बीजेपी ने जिन्हें मुख्यमंत्री बनाया उन्होंने ही दो वर्षो बाद साथ छोड़ दिया. बीजेपी के साथ ऐसा पहली बार नही हुआ. लेकिन हर बार बीजेपी बेबस और लाचार दिखती है. वजह साफ है नीतीश हैं तो मुमकिन है.
लेकिन नीतीश की इस हैसियत को चुनौती दी है उनके प्रमुख सिपहसलार रहे पूर्व केन्द्रीय इस्पात मंत्री और जद यू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आर सी पी सिंह ने. केन्द्रीय मंत्रिमंडल से बे आबरू होकर निकलने के बाद आर सी पी ने जद यू को डूबती नैया तो नीतीश को उस जहाज का खेबैया. माना.आर सी पी सिंह की इस बातों का समर्थन कभी उनके खास सखा रहे सुशील मोदी .भी करते हैं . मोदी का आरोप है कि नीतीश की पार्टी जद यू को समाप्त लालू प्रसाद करेगें.
2020 के विधान सभा चुनाव में जद यू के तीसरे पायदान पर पहुंचने की मुख्य वजह नीतीश बीजेपी और अपने पुराने राष्ट्रीय अध्यक्ष आर सी पी सिंह को मानते है. यही वजह है कि नीतीश ने बीजेपी से अलग होने का फैसला ही नही लिया है कभी साथ नही जाने की कसमें भी खायी है. दूसरी तरफ नीतीश का आरोप है कि बीजेपी ने गठबंधन धर्म का पालन नही किया और केन्द्रीय मंत्रिमंडल में आर सी पी को शामिल करने का फैसला उनकी सहमति के बगैर किया था.नीतीश का यह भी आरोप है कि महाराष्ट्र की तरह बीजेपी बिहार में आर सी पी को ए के शिंदे बनाने की कवायद शुरू की . शायद यही वजह रही कि नीतीश ने सबसे पहले आर सी पी को पार्टी से बेदखल किया और बीजेपी को सत्ता से बाहर .
बीजेपी को बिहार की सत्ता से बाहर करने के बाद नीतीश ने उसे केन्द्र से बाहर करने की रणनीति बनायी है.इसकी शुरूआत भी तेलांगना के मुख्यमंत्री केसीआर के बिहार दौरे के साथ शुरू हो चुकी है. नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विपक्षी एकता को मजबूत करने की कवायद से पहले नीतीश ने जद यू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक बुलाकर जहां पार्टी की सहमति ले ली है वही कार्यकर्ताओं का मनोबल बढाने के लिये जद यू ने नीतीश को प्रधान मंत्री पद का मजबूत उम्मीदवार बनाने का पासा भी फेंका है.
हालांकि नीतीश खुद को नकारते रहे हैं. लेकिन जद यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह का यह बयान काफी है कि जद यू प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है और नीतीश उसके मालिक . ललन के इसी बयान को पुख्ता करने के लिये जद यू के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव के सी त्यागी ने रविवार को कहा था कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के सर्वमान्य नेता नीतीश का भाषण ही पार्टी का गाइड लाइन है. यानि उस बैठक में नीतीश ने अपने नेताओं को बताया था कि किस तरह बीजेपी ने हमारे साथ धोखा दिया है और हमारी पार्टी के विधायकों को अरूणाचल प्रदेश मणिपुर और त्रिपुरा में तोडा गया है और बिहार में इसे दुहराये जाने का अभियान चलाया जा रहा था. नीतीश इसे राजनीतिक धोखाधड़ी मानते है.लेकिन आखिर नीतीश जी को कौन संमझाये कि पहली बार 2000 में मुख्यमंत्री बनने के लिये उन्होने निर्दलीय विधायकों को 2005 मेंलोजपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह समेत दो दर्जन विधायको को तोड़कर अपने दल में शामिल कराया था. इतना ही नही 2010 में दो तिहाई बहुमत के बाबजूद राजद को तोड़ने 2020 के चुनाव के पहले राजद और कांग्रेस के विधान पार्षदो को पार्टी में शामिल करने और चुनाव के बाद लोजपा और बसपा के एक -एक विधायकों को जद यू में शामिल कराकर विधान सभा में दोनों दलो की हैसियत जीरो तक पहुंचाने का काम किया था.
लेकिन कहावत है अंत भला तो सब भला . शायद इसी रणनीति के तहत राजद के साथ गठबंधन कर नीतीश ने पहले जद यू की डूबती नैया को किनारे लगाया है यानि सत्ता और पार्टी दोनो को बचाया है. दूसरी तरफ केन्द्र की राजनीति में हाशिये पर चले गये नीतीश ने 2024 में बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने के लिये विपक्षी एकता का बीड़ा उठाया है. विपक्षी एकता के बदौलत बीजेपी को 50 सीटो पर समेटने का दावा करने वाले नीतीश ने विपक्ष की चुनावी नाव की भी पतवार थामने और खुद मांझी बनने के अभियान की शुरूआत सोमवार को हस्तिनापुर यानि दिल्ली यात्रा से शुरूआत की है. हालांकि इस य़ात्रा के पहले उन्होनें राजनीति के बड़े भाई राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से मुलाकात कर उनसे आशीर्वाद भी लिया है. इस दौरे में नीतीश कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी समेत अनेक विपक्षी नेताओं से मुलाकात करेगें. देखना है कि विपक्ष की चुनावी नैया को पार लगाने का मंसूबा पाले नीतीश की नाव में कौन - कौन से नेता सवार हो पाते है.
अशोक मिश्रा , कशिश न्यूज.

