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सरकारी टेंडर घोटाले में पटना हाईकोर्ट सख्त, ED और SVU से पूछा- 6 अधिकारियों के नाम के बावजूद FIR में सिर्फ 3 क्यों?

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Deepak Kumarलेखक

पटना: बिहार में सरकारी टेंडरों में कथित हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। ऋषु श्री की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सत्यव्रत वर्मा की एकलपीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और विशेष निगरानी इकाई (SVU) से जांच की दिशा तथा वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की भूमिका को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। अदालत ने विशेष निगरानी इकाई के अपर पुलिस महानिदेशक (ADG) को मामले में पक्षकार बनाने और हलफनामा दाखिल कर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।

मामले में मुख्य सवाल यह है कि जब ईडी ने कथित अनियमितताओं के संबंध में छह वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के नाम साझा किए थे, तो उनमें से केवल तीन अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की वजह क्या थी? अदालत ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका, जांच में हुई प्रगति और अन्य लोगों से पूछताछ को लेकर भी सवाल किए।

छह अधिकारियों के नाम, FIRमें सिर्फ तीन क्यों?

सुनवाई के दौरान अदालत ने ईडी की ओर से साझा की गई जानकारी और उसके बाद हुई कार्रवाई के बीच के अंतर पर सवाल उठाए। उपलब्ध विवरण के अनुसार, ईडी ने छह वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ विश्वसनीय इनपुट साझा किए थे। इसके बाद मुमुक्षु चौधरी, तरणी दास और उमेश कुमार नामक तीन अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने का उल्लेख सामने आया।

अदालत ने जानना चाहा कि शेष अधिकारियों की भूमिका की जांच में अब तक क्या तथ्य सामने आए हैं। यदि उनके नाम भी जांच के दौरान सामने आए थे, तो उनसे पूछताछ के लिए समन जारी करने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई पर स्पष्ट जानकारी मांगी है।

EDऔरSVUकी भूमिका पर अदालत के सवाल

मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा66 के तहत संबंधित जांच एजेंसी को जानकारी साझा की थी। इसके आधार पर विशेष निगरानी इकाई में प्राथमिकी दर्ज होने का मामला सामने आया।

अदालत ने एसवीयू की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह जानना चाहा कि ईडी से सूचना मिलने के बाद कार्रवाई किस आधार पर की गई। साथ ही, यदि सूचना में अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भी शामिल थे, तो उनके संबंध में आगे की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

हाईकोर्ट ने एसवीयू के अपर पुलिस महानिदेशक को मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश देते हुए उनसे हलफनामे के जरिए जवाब मांगा है।

संजीव हंस के अलावा अन्य अधिकारियों के नाम पर भी स्पष्टीकरण मांगा

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी जानना चाहा कि PMLA की धारा 66 के तहत सूचना साझा करते समय संजीव हंस के अलावा किसी अन्य सरकारी अधिकारी का नाम भी शामिल था या नहीं। यदि अन्य अधिकारियों के नाम साझा किए गए थे, तो क्या एसवीयू के समक्ष इस संबंध में कोई आपत्ति दर्ज कराई गई थी? अदालत ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि प्राथमिकी में कुछ अधिकारियों के नाम शामिल किए जाने और अन्य के नाम नहीं आने के पीछे क्या कारण थे।

अदालत के सवालों का उद्देश्य जांच की प्रक्रिया, उपलब्ध तथ्यों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका के संबंध में स्थिति स्पष्ट कराना है।

ईडी के जवाब पर भी अदालत ने मांगी स्पष्टता

याचिकाकर्ता की ओर से मामले में वरिष्ठ अधिकारियों की कथित संलिप्तता का मुद्दा उठाया गया है। वहीं, जांच एजेंसियों की ओर से की गई कार्रवाई और उनके जवाबों को लेकर अदालत ने अतिरिक्त स्पष्टीकरण मांगा है।

अदालत ने जांच के दौरान सामने आए तथ्यों, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और अब तक की कार्रवाई की जानकारी देने को कहा है। मामले में याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में है। यह मामला सरकारी टेंडरों में कथित अनियमितताओं और धनशोधन से जुड़े आरोपों की जांच से संबंधित है। आरोपों की अंतिम सत्यता और किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया तथा जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही होगा।

27नवंबर 2026को अगली सुनवाई

मामले में अब संबंधित जांच एजेंसियों के जवाब और हलफनामे पर नजर रहेगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पटना हाईकोर्ट में मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 को निर्धारित है। सुनवाई के दौरान एसवीयू और ईडी की ओर से दिए जाने वाले स्पष्टीकरण से जांच की दिशा और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट

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