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पटना HC ने कोविड मुआवजे पर लापरवाही के लिए बिहार सरकार को लगाई कड़ी फटकार

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MADAN KISHORE JHAलेखक

Patna : पटना हाईकोर्ट ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि राज्य मानवीय पीड़ा का मूकदर्शक नहीं हो सकता, कोविड मुआवजे पर लापरवाही के लिए बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाई. बिहार में सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और लापरवाही का एक और मामला सामने आया है, जिसे लेकर हाईकोर्ट ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग को बेहद कड़ी फटकार लगाई है.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि एक कल्याणकारी राज्य में सरकार मानवीय पीड़ा की ‘दूर की दर्शक’ नहीं बन सकती, बल्कि उसका यह संवैधानिक और वैधानिक कर्तव्य है कि वह आपदा के समय अपने नागरिकों के साथ खड़ी रहे. कोर्ट ने यह कडी टिप्पणी उस मामले में की जिसमें बिहार सरकार के अधिकारियों ने कागजी त्रुटियों और अपनी ही अस्पताल की लापरवाही की आड़ लेकर कोरोना से जान गंवाने वाले एक व्यक्ति के परिजनों को मिलने वाले अनुग्रह अनुदान को मामूली आधार पर रद्द कर दिया था.

यह पूरा मामला पटना जिले के मोकामा का है, जहां की रहने वाली शांति देवी (पति- स्व. राम भजन चौधरी) ने पटना हाईकोर्ट में सिविल रिट याचिका दायर की थी. याचिकाकर्ता के पति राम भजन चौधरी, जो कि 68 वर्ष के थे, कोविड-19 की दूसरी और अत्यंत घातक लहर के दौरान 5 जनवरी, 2022 को नालंदा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पटना के इमरजेंसी वार्ड में पहुंचे.

पीडि़त को पिछले पांच दिनों से तेज बुखार,खांसी और कमजोरी की शिकायत थी. एनएमसीएच के इमरजेंसी आउटडोर रजिस्ट्रेशन स्लिप (संख्या99822140000471)के मुताबिक,शाम करीब5:36बजे ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने उनकी जांच की. उन्हें अस्पताल में भर्ती करने से पहले आरटी-पीसीआर (RT-PCR)जांच कराने की सलाह दी.

गले का सैंपल लेने के बाद डॉक्टर ने पर्ची पर संदर्भ संख्या ‘RT-57779’ दर्ज की. लेकिन काल के गाल में समा रहे मरीज की स्थिति तेजी से बिगड़ी और उसी शाम करीब 6:20 बजे इमरजेंसी वार्ड में ही उनकी दर्दनाक मौत हो गई.

पति की दुखद मृत्यु के बाद, विचलित पत्नी शांति देवी ने 7 मार्च, 2022 को सभी 7 आवश्यक दस्तावेजों के साथ अनुग्रह अनुदान के लिए आवेदन किया. नियम के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के आदेश और आपदा प्रबंधन दिशानिर्देशों के तहत कोविड से जान गंवाने वाले व्यक्ति के आश्रितों को 4 लाख रुपये की सहायता राशि दी जानी है.

लेकिन बिहार स्वास्थ्य समाज और जिला प्रशासन की तीन सदस्यीय समिति ने इस गंभीर मामले में बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया. समिति ने3फरवरी,2023को जारी अपनी में राम भजन चौधरी के नाम को यह कहकर खारिज कर दिया कि लैब रिपोर्ट मृत्यु की तिथि के बाद की है.

याचिकाकर्ता और उनके बेटे ने जिला लोक शिकायत से लेकर द्वितीय अपील तक कई चक्कर काटे, ई-मेल और आवेदन दिए, लेकिन हर जगह फाइलों के लाल फीताशाही और बाबूशाही तंत्र ने न्याय देने के बजाय कागजी भूल-भुलैया में परिवार को उलझाए रखा.

इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आलोक कुमार ने राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई. कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अस्पताल के माइक्रोबायोलॉजी विभाग (NMCH) के पत्र संख्या 62/Micro दिनांक 08.02.2024 से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो चुका था कि सैंपल आईडी 57779 और राम भजन चौधरी के नाम से लिया गया टेस्ट पॉजिटिव (CT Value 21.3) था.

तिथियों में जो अंतर दिख रहा था, वह अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा डेटा-एंट्री या रिकॉर्ड दर्ज करने की लिपिकीय भूल थी, न कि याचिकाकर्ता या उसके परिवार की कोई गलती.

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में राज्य सरकार को निम्न.बेहद कड़े और ऐतिहासिक निर्देश दिए.

कोर्ट ने दो टूक कहा कि एक कल्याणकारी राज्य में सरकार का यह प्राथमिक दायित्व है कि वह संविधान के अनुच्छेद 21 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत मानवीय गरिमा और जीवन की रक्षा करे. आपदा के समय अपनों को खोने वाले नागरिकों को न्याय और वित्तीय मुआवजा देना उसका वैधानिक कर्तव्य है.

कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि अस्पताल के कर्मचारियों की डेटा एंट्री की गलती या तारीख के मामूली अंतर को आधार बनाकर किसी गरीब और पीड़ित परिवार के वैध दावे को खारिज करना पूरी तरह से मनमाना, अतार्किक, यांत्रिक और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है. अस्पताल ने खुद माना है कि मरीज का सैंपल पॉजिटिव था, ऐसे में केवल कागजी खानापूर्ति के नाम पर पीड़ित को प्रताड़ित करना सहन नहीं किया जाएगा.

कोर्ट ने 'गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ' मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए मानदंडों का हवाला दिया, जिसके तहत अस्पताल में भर्ती के दौरान या 30 दिनों के भीतर कोविड पॉजिटिव पाए जाने वाले हर व्यक्ति की मृत्यु को कोविड से हुई मौत माना गया है. राज्य समिति ने इन स्पष्ट नियमों को ताक पर रखकर मनमाने फैसले लिए.

पटना हाईकोर्ट ने राज्य स्वास्थ्य समिति की त्रि-सदस्यीय समिति द्वारा 25 जनवरी ,2023 को लिए गए उस फैसले और 3 फरवरी ,2023 की अधिसूचना को पूरी तरह से रद्द कर दिया, जिसके जरिए मुआवजे का दावा रद्द किया गया था.

इसके साथ ही,कोर्ट ने प्राधिकारी को कड़ा निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर5जनवरी,2022की इमरजेंसी आउटडोर पर्ची,आरटी-पीसीआर रिकॉर्ड और एनएमसीएच के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के पत्र (दिनांक08.02.2024)के आलोक में4सप्ताह के भीतर नए सिरे से पुनर्विचार किया जाए. यदि मृतक की पत्नी पात्रता की शर्तों को पूरा करती है,तो चार लाख रुपये.की अनुग्रह राशि और अन्य सभी देय लाभ अगले4हफ्तों के भीतर अनिवार्य रूप से उनके खाते में जारी किए जाएं.

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट--

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