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पटना HC ने बिना किसी आधार के नागरिक को 'असामाजिक तत्व' घोषित करने की कार्रवाई को किया रद्द

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MADAN KISHORE JHAलेखक

Patna : पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले के प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस द्वारा की गई मनमानी और बिना किसी ठोस आधार के एक नागरिक को'असामाजिक तत्व'घोषित करने की कार्रवाई को पूरी तरह रद्द कर दिया है. जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद एवं जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की पीठ ने'बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2024'के तहत बांका के जिलाधिकारी द्वारा जारी किए गए अवैध आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता गिरधारी यादव के पक्ष में यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि केवल पुलिस की एक'सनहा' (स्टेशन डायरी) प्रविष्टि के आधार पर किसी भी नागरिक को मौलिक अधिकारों का वंचित नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को एक लाख रुपए बतौर मुआवजा और मुकदमे के व्यय के लिए दस हजार रुपए देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये धनराशि जिम्मेदार अधिकारी से वसूला जाए.

यह मामला बांका जिला के कटोरिया निवासी गिरधारी यादव का है,जो चुनाव से पहले पुलिस कार्रवाई के जद में आ गये थे. स्थानीय पुलिस ने बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024के अंतर्गत आरोप लगाया कि दो मामलों में जमानत पर बाहर चल रहे याचिकाकर्ता गिरधारी यादव संदिग्ध लोगों से मिल रहे हैं व सार्वजनिक शांति भंग कर सकते हैं.

स्थानीय पुलिस निरीक्षक द्वारा दर्ज कराई गई अस्पष्ट थाना डायरी प्रविष्टि के आधार पर,बांका के जिलाधिकारी ने उन्हें समाज विरोधी तत्व घोषित कर दिया. जिलाधिकारी ने गिरधारी यादव को उनके घर से40किलोमीटर की दूरी पर स्थित बाराहाट थाने में चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने तक10बजे सुबह से लेकर शाम पांच बजे तक उपस्थित रहने व बैठे रहने का आदेश दिया.

कोर्ट ने इस आपराधिक रिट याचिका को स्वीकार करते बांका के जिलाधिकारी द्वारा पारित विवादित आदेश दिनांक08.09.2025को इसके द्वारा रद्द कर दिया. हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस की अनियंत्रित कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए कड़ी टिप्पणी की.

कोर्ट ने सनहा के साक्ष्य मूल्य पर कहा कि केवल'सनहा'का कोई साक्ष्य मूल्य नहीं है. केवल पुलिस अधिकारी द्वारा सनहा में व्यक्त किए गए एक कोरे बयान और संदेह के आधार पर राय बनाने का आधार नहीं हो सकता. पुलिस द्वारा इस प्रकार की निरंकुश और असीमित शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों का हनन करार दिया. कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार में हस्तक्षेप करने वाले कार्यपालक आदेश का निष्पादन पुलिस अधिकारी की इस प्रकार की अनियंत्रित और निरंकुश स्वेच्छाचारिता के तहत नहीं किया जा सकता.

जिलाधिकारी की यह कार्रवाई नियमों का उल्लंघन है,जिसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को कठिनाई का सामना करना पड़ा. इस दौरान उन्हें बेरोजगार कर दिया गया. ये धनराशि लापरवाह अफसरों की जेब से मुआवजा वसूला जाएगा.

हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को भारतीय संविधान के अनुच्छेद21के तहत प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना है. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को1,00,000रुपये का मुआवजा तथा10,000रुपये की कानूनी लागत का भुगतान किया जाए.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि लागत और मुआवजे की राशि इस अदालत के फैसले के आलोक में दोषी अधिकारियों से वसूल किया जाएगा. जब भी राज्य के किसी कार्यपालक द्वारा शक्ति के दुरुपयोग के लिए राज्य पर लागत और मुआवजा लगाया जाता है,तो उसे दोषी अधिकारियों से वसूल किया जाना आवश्यक है.

राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि वह याचिकाकर्ता को इस राशि का भुगतान एक महीने के भीतर करे और अगले छह महीनों के अंदर दोषी पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों से इसकी वसूली पूरी करे.

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-

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