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पटना HC ने अधिवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही किया रद्द
Patna : पटना हाईकोर्ट ने वकील को मुकदमेबाजी में घसीटने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि चाहे आसमान गिर जाए,न्याय होना चाहिए. हाईकोर्ट ने एफआईआर भी रद्द की. हाईकोर्ट ने एक मील का पत्थर साबित होने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि पेशेवर कानूनी राय देने के लिए किसी वकील पर आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता.
जस्टिस राणा विक्रम सिंह की पीठ ने35साल के अनुभवी वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए व्यवस्था दी कि केवल राय गलत साबित होने या लोन एनपीए बनने से वकील को जालसाज या साजिशकर्ता नहीं माना जा सकता.
ये मामला साल2008का है,जब यूको बैंक (UCO Bank)की एग्जीबिशन रोड शाखा में फर्जी कागजातों के आधार पर लाखों रुपये का कैश-क्रेडिट लोन स्वीकृत किया गया था. बाद में जब लोन खाते एनपीए हो गए और बैंक को लगभग29.54लाख रुपये का नुकसान हुआ,तो बैंक मैनेजरों,कर्जदारों और जमानतदारों के साथ-साथ बैंक के पैनल वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल को भीIPCकी धारा420, 406, 467, 468, 471और120Bके तहत आरोपी बना दिया गया.
निचली अदालत (ACJMपटना) ने2016में संज्ञान भी ले लिया था,जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. जस्टिस राणा विक्रम सिंह ने कड़ी टिप्पणियां करते हुए न्याय प्रणाली और वकीलों की स्वतंत्रता पर कई महत्वपूर्ण और आंखें खोल देने वाली बातें कही.
उन्होंने कहा कि वकील कानून का रक्षक होता है,न कि अपराध का साझेदार. जस्टिस राणा विक्रम सिंह ने लैटिन सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा वकील कानून का रक्षक होता है,न कि अपराध में भागीदार. प्रशासनिक न्याय प्रणाली की मांग है कि वकील को बिना किसी अनावश्यक मुकदमेबाजी के डर के अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को निर्भीक होकर निभाने दिया जाए. जब तक वकील की ओर से कोई स्वतंत्र आपराधिक धोखाधड़ी न की गई हो,उसे पेशेवर संरक्षण प्राप्त है.
कोर्ट ने ये भी कहा कि वकील सौ फीसदी केस जीतने या बेदाग राय की गारंटी नहीं देता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैसे डॉक्टर मरीज को शत-प्रतिशत ठीक होने की गारंटी नहीं दे सकता,वैसे ही वकील भी सौ फीसदी बेदाग फैसले का आश्वासन नहीं दे सकता है. एक वकील का कर्तव्य अपने मुवक्किल के प्रति निष्ठा रखना है. यदि उसकी राय बाद में गलत निकलती है,तो इसका मतलब यह नहीं कि वह साजिश में शामिल था."
कोर्ट ने कहा कि डर के माहौल में कोई वकील खुलकर सलाह नहीं दे पाएगा. जस्टिस सिंह ने चेताया कि यदि कानूनी राय देने पर ही वकीलों पर एफआईआर दर्ज होने लगी,तो पूरी न्याय व्यवस्था चरमरा जाएगी. अगर हर गलत कानूनी राय पर वकील को आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ा,तो कोई भी वकील बिना डर और पक्षपात के अपनी सलाह नहीं दे सकेगा. यह न्याय वितरण प्रणाली के लिए विनाशकारी होगा.
वकील ने तो बैंक को खुद सावधान रहने की सलाह दी थी.
रिकॉर्ड खंगालने पर कोर्ट ने पाया कि वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने अपनी लीगल रिपोर्ट में बैंक को साफ-साफ लिखा था कि कागजात देखकर राय दी जा रही है और बैंक को खुद भी अपने स्तर पर इनका सत्यापन कर लेना चाहिए. इसके बावजूद उन्हें मुकदमे में घसीटा गया,जो पूरी तरह से द्वेषपूर्ण मुकदमा था.
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सख्त नाराजगी जताई कि निचली अदालत (ACJMपटना) ने संज्ञान आदेश कैसे पारित किया था. जस्टिस राणा विक्रम सिंह ने पाया कि आदेश का पूरा प्रारूप कोर्ट के किसी क्लर्क/स्टाफ ने लिखा था और नीचे खाली जगह छोड़ी थी,जिसमें जज साहब ने केवल शब्द खुद भरकर दस्तखत कर दिए थे.
जस्टिस सिंह ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन दांव पर लगा होता है,जब उसे समन भेजा जाता है. मजिस्ट्रेट को अपना न्यायिक दिमाग लगाना चाहिए न कि किसी क्लर्क के लिखे पर पन्ना भरकर औपचारिक साइन कर देने चाहिए.
हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए वकील के खिलाफ सभी केस समाप्त कर दिया. पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामलों (जैसेCBI vs K. Narayana RaoएवंState of Haryana vs Bhajan Lal)का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ एससीजेएम कोर्ट द्वारा लिए गए संज्ञान और पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया. फैसले के अंत में जस्टिस राणा विक्रम सिंह ने अपने लॉ क्लर्क्स और रिसर्च असिस्टेंस की सराहना करते हुए मामले का पटाक्षेप किया.
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-
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