Live

BIHAR NEWS

पांच सवाल, जिनका जवाब चुनाव आयोग को देना ही होगा — दीपंकर भट्टाचार्य

M
MADAN KISHORE JHAलेखक

पटना: भाकपा माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए हैं. 1 अक्टूबर को चुनाव आयोग द्वारा सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य चुनाव आयुक्तों के नाम पत्र जारी किया गया है जिसमें जिन लोगों के नामSIRके बाद भी मतदाता सूची से बाहर है और फर्स्ट टाइम वोटर हैं,उनके नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया गया है.

भाकपा माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, और आयोग से पांच सवाल पूछा है. उन्होंने कहा कि अब चुनाव आयोग (ईसीआई) चाहता है कि बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) एक महीने के भीतर उन मतदाताओं तक पहुंचें,जिन्हें वह'छूटे हुए'मतदाता बता रहा है. लेकिन ये मतदाता छूटे हुए नहीं हैं. इनमें से ज्यादातर को जानबूझकर और चुन-चुनकर मतदाता सूची से बाहर किया गया है. उन्होंने पार्टी के जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि हमने बिहार के कुछ चुनिंदा बूथों पर घर-घर जाकर ऐसे मतदाताओं का सर्वे किया और पाया कि एसआईआर के तहत कम से कम 17 प्रतिशत मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे गए हैं.

दूसरे शब्दों में,चुनाव आयोग अब खुद मान रहा है कि एसआईआर की प्रक्रिया में लाखों मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया है. अब पांच अहम सवाल हैं,जिनका जवाब चुनाव आयोग को देना होगा.

1. इन मतदाताओं से फॉर्म-6 क्यों भरवाया जाना चाहिए,जबकि यह फॉर्म पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के लिए है?गलती चुनाव आयोग की है. उसे अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए और खुद उसे सुधारना चाहिए.

2. एसआईआर की असलियत अब सबके सामने है. यह मतदाताओं को वोट के अधिकार से वंचित करने का हथियार और साजिश है. इसे तत्काल रद्द किया जाए,इसके असर को पलटा जाए और जिन-जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे गए हैं,उनका वोट का अधिकार तुरंत बहाल किया जाए.

3. बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटने का असर सिर्फ उन मतदाताओं पर ही नहीं पड़ा है,जिन्हें वोटर लिस्ट से बाहर किया गया. इससे चुनाव की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई है और कई मामलों में चुनाव के नतीजे भी प्रभावित हुए हैं. दोबारा मतदान के अलावा इस नुकसान की भरपाई कैसे हो सकती है?

4. वोट से बेदखली के इस जबरन बुलडोजर अभियान के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही तय होनी चाहिए. उन्हें अपना जुर्म कबूल कर तुरंत इस्तीफा देना चाहिए. 2023 का वह कानून भी रद्द किया जाए,जिसने सत्ता में बैठी सरकार को अपनी पसंद के चुनाव आयुक्त चुनने की खुली छूट दे दी और आयुक्तों को आजीवन कानूनी कार्रवाई से छूट देकर देश के कानून से ऊपर बिठा दिया. चुनाव आयोग की निष्पक्षता,पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं.

5. मतदाता सूची की "सफाई" के नाम पर इस काले कारनामे को अंजाम देने का काम ज्ञानेश कुमार को सौंपा गया,जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह ने इसके लिए ही नियुक्त किया था. अब जब इस जुर्म में ज्ञानेश कुमार की भूमिका पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है,तो क्या मोदी और शाह इस साजिश में अपनी मिलीभगत के लिए जवाबदेही से बच सकते हैं?

पटना से अंकिता की रिपोर्ट-

इस ख़बर को शेयर करें

अपने दोस्तों और परिवार तक यह ख़बर पहुँचाएँ।

पूरी वेबसाइट पर पढ़ें और ख़बरें