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झारखंड की 9 जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान दिलाने के लिए बंधु तिर्की की अगुवाई में पैदल मार्च, आयोग गठन की मांग

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Deepak Kumarलेखक

मोरहाबादी की बापू वाटिका से निकला मार्च,शिक्षण संस्थानों में भाषाओं की पढ़ाई और सरकारी स्तर पर मान्यता देने की उठी मांग;सरकार को सौंपा जाएगा ज्ञापन
रांची: झारखंड में बोली जाने वाली जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को उचित सम्मान, संरक्षण और मान्यता दिलाने की मांग को लेकर बुधवार को राजधानी रांची में पैदल मार्च निकाला गया। पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बंधु तिर्की की अगुवाई में मोरहाबादी स्थित बापू वाटिका से निकले इस मार्च में जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण की मांग उठाई गई। प्रदर्शनकारियों ने झारखंड में बोली जाने वाली सभी नौ जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को उचित पहचान देने, इनके संरक्षण के लिए अलग आयोग गठित करने और शिक्षण संस्थानों में इनकी पढ़ाई की व्यवस्था करने की मांग की।

भाषाओं के साथ सरकार न्याय नहीं कर रही-बंधु तिर्की
पैदल मार्च का नेतृत्व कर रहे बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड में बोली जाने वाली जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के साथ सरकार न्याय नहीं कर रही है। राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए विरोध प्रदर्शन और पैदल मार्च का आयोजन किया गया है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार को ज्ञापन भी सौंपा जाएगा, ताकि भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें।

भाषाओं के संरक्षण के लिए आयोग बनाने की मांग
बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को बचाने के लिए अलग आयोग का गठन जरूरी है। इसके साथ ही स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शिक्षण संस्थानों में इन भाषाओं की पढ़ाई की व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य गठन के 26 साल बाद भी यहां की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को वह पहचान और सम्मान नहीं मिल पाया है, जिसकी वे हकदार हैं।

सरकारी नौकरियों और सुविधाओं में भी मिलना चाहिए लाभ
बंधु तिर्की ने कहा कि भाषाओं को उचित मान्यता और संरक्षण नहीं मिलने का असर यहां के आदिवासी और क्षेत्रीय समाज के लोगों पर भी पड़ रहा है। उनका कहना है कि भाषाई पहचान और मान्यता के अभाव में लोगों को सरकारी नौकरियों और अन्य सुविधाओं का लाभ लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

भाषा और संस्कृति के संरक्षण को लेकर उठी आवाज
पैदल मार्च के माध्यम से प्रदर्शनकारियों ने राज्य की भाषाई विविधता और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की मांग की। उनका कहना है कि जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान, इतिहास और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अब देखना होगा कि राज्य सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है और जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण के लिए आयोग गठन तथा शैक्षणिक व्यवस्था को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है।

रांची से राजीव मोहन की रिपोर्ट

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